रूस का इतिहास व सोवियत रूस का विश्व मानचित्र पर उदय | Hindi Ghostwriting Sample

May - 14
2018

रूस का इतिहास व सोवियत रूस का विश्व मानचित्र पर उदय | Hindi Ghostwriting Sample

  • खूनी रविवार और 1905 की क्रांति
  • द्वितीय विश्व युद्ध
  • क्रांति व गृह युद्ध
  • नई आर्थिक नीति
  • 1922 की संधि व राष्ट्रीयकरण
  • स्टालिन युग

रविवार का दिन, 09 जनवरी की सुबह विश्व राजनीतिक घटनाक्रम में एक नया अध्याय लिखने की तैयारी कर रहा था । किसी को यह अंदाजा नहीं था कि एक साधारण सा दिखने वाला घटनाक्रम जो जनमानस के द्वारा सत्तासीन के समक्ष अपनी मासूम शिकायतों को जताने, बताने, और उन्हें दूर करने की महज़ इल्तिज़ा भर थी वो एक दिन आधुनिक इतिहास की क्रोनोलॉजी में काले अक्षरों से अंकित कर दिया जायेगा।

कुछ 150,000 लोग छः अलग-अलग पूर्व-निर्धारित स्थलों पर एकत्रित होते हैं। रुसी जनता के इस जमघट का उद्देश्य रुसी सत्ता प्रतिष्ठान का प्रतीक विंटर पैलेस में सत्ताधीश व आम रूसियों के मध्य “लिटिल फादर” के नाम से मशहूर – ज़ार निकोलस द्वितीय को अपनी-अपनी  मजबूरियों, ग़रीबी और ग़ुरबत के बीच से गुज़रती ज़िन्दगी की हकीक़त से रू-ब-रू करवाना चाहते थें।

लोगों के हुज़ूम का प्रतिनिधित्व कर रहे थे रूस में ईसाइयत के ऑर्थोडॉक्स धड़े के जनप्रिय पादरी फादर जॉर्ज गपोन। फादर गपोन असेंबली ऑफ़ रसियन फैक्ट्री एंड मिल वर्कर्स के प्रमुख हुआ करते थे। गौर करने की बात है कि उन दिनों रूस के आंतरिक मंत्रालय ने नए-नए तौर पर ही ट्रेड यूनियनों के गठन और सञ्चालन की मंजूरी प्रदान की थी। रुसी आंतरिक मंत्रालय के इस तथाकथित उदारवादी निर्णय के पीछे ज़ार के शासन के प्रति एक ‘सेफ्टी वॉल्व’ की माफ़िक सुरक्षा परिधि बनाने की मंशा थी जिसके माध्यम से न केवल शासनक्रम को लोगों के शिकवा-शिकायतों के कड़वेपन से बचाया जाय बल्कि आमजनों के मध्य ज़ार और शासन के प्रति वफ़ादारी को बढ़ावा दिया जाए।

यह अलग बात है कि रुसी आंतरिक मंत्रालय ने ‘सेफ्टी वाल्व’ की धारणा को लेकर ट्रेड यूनियनों के गठन को  हरी झंडी दी थी कि इससे शासन के प्रति जनता के मध्य उबाल ले रहे ग़ुस्से और शिक़ायतों को एक ट्रेड यूनियनों की शक़्ल में एक बफर जोन में रोकने की गुंज़ाइश बनती पर इसके उलट गेपॉन ने शासनक्रम के प्रति अपने तल्ख़-मिज़ाजी को ऊँचे स्वरों में उज़ागर करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी । फलतः रुसी शासन के गलियारों में गेपॉन को शक़ की निगाहों से देखा जाने लगा था।

बताते चलें कि गेपॉन ने यूनियन ऑफ़ लिबरेशन नाम की मध्यवर्गीय लिबरल बुद्धिजीवियों द्वारा संचालित एक संस्था  से संपर्क साधे और उनसे भावी मुद्दों पर विचार-विमर्श किया करते थें। गेपॉन के इस कार्य ने रुसी शासन वर्ग के महत्वपूर्ण लोगों को ख़ासा नाराज़ कर दिया था। इसी क्रम में गेपॉन के कार्यों का ख़ामियाजा इस स्वरुप में सामने आया जब उनके संगठन के चार सदस्यों को उनकी नौकरी  से हाथ धोना पड़ा। गेपॉन ने अपना विरोध जताते हुए स्ट्राइक की शुरुवात की जो देखते-ही-देखते मिल मज़दूरों में बेहद तेज़ी से अपनी पैठ बना लेता हैं। जो आगे चलकर 120,000 मिल मज़दूरों की ज़ोरदार अभिव्यक्ति बनकर सामने आता है।

जनवरी के उस रविवार को महिलाओं और बच्चों सहित लाखों आम रुसी मज़दूर एकत्रित हुए थे। मार्च की अगुवानी महिलायें और बच्चें कर रहे थे। हलाकि शासन से कम उम्मीदें बांधें हुए वे गाजे-बाजे के साथ बढ़े चले जा रहे थे  जैसे मानो वे किसी धार्मिक तीर्थ पर निकले हों। यूनियन ऑफ़ लिबरेशन से प्रेरणा लेते हुए उनकी निम्नलिखित माँग रहीं :

  • काम के घण्टों को आठ घंटें किया जाए;
  • हड़ताल करने की आज़ादी हो;
  • संविधान सभा का गठन किया जाए;
  • सभी को मत देने का अधिकार मिले ;
  • सीक्रेट बैलट का प्रावधान हो।

पर खेदजनक रूप से लोगों का हुज़ूम कभी भी विंटर पैलेस नहीं पहुँच पाया। ज़ार को इस प्रोटेस्ट की ख़बर पुलिस के मुखबिरों से पहले ही लग चुकी थी। भीड़ का सामना करने से बचने के लिए वह परिवार के अन्य सदस्यों समेत विंटर पैलेस से रफ़ूचक्कर हो चूका था। ज़ार-परिवार और शासन के नुमाइंदे के तौर पर विंटर पैलेस में केवल ग्रैंड ड्यूक व्लादिमीर, ज़ार का चाचा और सिक्योरिटी पुलिस का चीफ, ही मौजूद था। शहर में होने वाले प्रोटेस्ट मार्च से निपटने की जिम्मेदारी व्लादिमीर के कन्धों पर ही थी। व्लादिमीर ने भरसक प्रयत्न किया पर वो प्रोटेस्ट को रोकने में असफल रहा और गेपॉन के नेतृत्व में जुलूस निकला ज़रूर।

हलाकि यह भी एक तथ्य है कि गेपॉन ने तमाम मिल मज़दूरों के साथ अपने विंटर पैलेस जाकर पेटिशन देने के इरादे कि खबर को सेंट पीटर्सबर्ग के अधिकारियों तक पहुँचा दिया था। शायद यही एक वज़ह रही होगी जिसने ज़ारवादी शासनक्रम को चौकन्ना कर सेंट पीटर्सबर्ग की तमाम आमों-ख़ास सड़कों और महत्वपूर्ण चौराहों पर राइफलधारियों की फौरी तैनाती करने पर मज़बूर कर दिया होगा। ग्रेगॉरियन कैलेंडर के मुताबिक 22 जनवरी रविवार के दिन, ज्यों-ज्यों भीड़ पीटर्सबर्ग की सड़कों पर जहाँ-जहाँ से गुज़री ज़ार के नुमाइंदों ने वॉर्निंग शॉट्स फायर करके भीड़ को भयक्रांत व हतोत्साहित करने का दुःसाहस कर रहीं थे।

घटना को आगे बढ़ाने से पहले एक बार फिर इस विस्फोट को भूमिका में बारूद देने का काम करने वाले अंडरग्राउंड संगठन यूनियन ऑफ़ लिबरेशन और उसके वैचारिक प्रभाव की विवेचना करना भी आवश्यक है। दरअसल रविवार को पीटरस्बर्ग की सडकों पर उमड़ा जनसैलाब यकायक ही घटित हुआ था बल्कि दूर हासिये पर नज़र आने वाली कई घटनाओं का यह चरम बिंदु था।

हालाँकि मार्च कभी भी अपने अंजाम विंटर पैलेस तक नहीं पहुँच पाया। ज़ार के मंत्रियों ने यह मंसूबा बनाया कि गेपॉन के नेतृत्व में चले आ रहे मार्च को विंटर पैलेस से पहले रोकना होगा। उन्होंने उसके लिए शहर के महत्वपूर्ण स्थानों पर हज़ारों की संख्या में सशस्त्र बलों की तैनाती की, पर यह अपेक्षा की गयी थी कि बल-प्रयोग की कोई ज़रुरत नहीं पड़ेगी।

उफान मारती नदी की तरह भीड़ विंटर पैलेस की ओर तेजी से बढ़ती चली आ रही थी इसको देख सशस्त्र बलों की तरफ से कुछ सैनिकों ने घबराहट में आकर हवाई फायरिंग करनी शुरू कर दी। इसी दौरान अपनी तरफ तेज़ी से बढ़ती ग़ुस्साई भीड़ को देख कुछ सैनिकों ने अलबलाते हुए भीड़ में ही फायरिंग कर डाली।

नर्वा गेट के पास फादर गेपॉन स्वयं भीड़ का नेतृत्व कर रहें होते हैं। फादर गेपॉन अपनी आँखों के सामने चालीस लोगों की निर्मम हत्या देख विचलित व भयाक्रान्त हो उठें। फादर गेपॉन के शब्द “ईश्वर अब नही रहा, अब कोई ज़ार नहीं है,” सीधे-सीधे जार के शाशन के खिलाफ जंग के बिगुल के सामान थे |

त्रोइत्स्की ब्रिज के पास मार्च के कोसैक कैवेलरी के द्वारा भीड़ के ऊपर बर्बर यत्नों से त्रासदी बरसाई गयीं। नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट के पास भीड़ पर, जिसमे बच्चें व महिलायें भी शामिल थीं, बिना किसी भेदभाव के लाठियाँ से प्रहार किया गया।

इतिहास गवाह है, अगर ज़ार के प्रति लोगों के अडिग विश्वास को तोड़ने वाला कोई वाक़्या हुआ भी तो यह घटना उन सभी घटनाओं में सबसे दुर्दांत रही। गेपॉन ने रूस छोड़ विदेशी सरज़मी का रुख़ कर लिया पर इसी वक़्त समूचे रूस में विरोध प्रदर्शनों की झड़ी लग गयी। लोगों का रोष अपने चरम पर था, ज़ार निकोलस II मज़बूर रियायतें देने के लिए तैयार हो गया। ज़ार निकोलस II ने अक्टूबर मैनिफेस्टो जारी किया जिसमे उसने रूस में डेमोक्रेसी लाने की बात कही । इसी दरम्यान हालिया घटनाक्रम से प्रभावित होकर फादर गेपॉन रूस वापस आते हैं लेकिन सरकार ने अपने एजेंटो को उसके पीछे भिड़ा दिया। आख़िरकार फादर गेपॉन की हत्या हो जाती हैं। तथापि अक्टूबर मैनिफेस्टो ने रूस में क्रांति की आग सुलगा दी थी।

इतिहास में यह दिन खूनी रविवार के नाम से कुख्यात हो गया।

प्रथम रुसी क्रांति की कहानी  – रिफॉर्म्स की असफ़ल कहानी

उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दशकों तक रूस कमो-बेस एक स्थायी शासन (ज़ारतंत्र) से गुज़र रहा था और यूरोप के अन्य राजतन्त्रो के ठीक उलट किसी भी तरह के क्रांतिकारी परिघटना से अछूता था। हालाँकि साल 1830 तथा 1863 में हुए दो पोलिश विद्रोहों को रुसी सेना ने निर्ममता के साथ दमन किया था। साथ-ही-साथ, क्रन्तिकारी संगठनो के छोटे-छोटे समूहों पर ज़ार शासन की पुलिस ने कड़ाई के साथ अपना सर्विलांस बनाये रखा और उनकी किसी भी संदिग्ध गतिविधि को गंभीरता से लेते हुए उन्हें प्रताड़ित किया गया।

सभी तरह के छोटे-बड़े विरोध के स्वरों को हर तरह के उपाय अपना कर ज़ार के रूस ने अपने आप को रिफार्म और बदलाव की ताज़ी हवा से दूर भूमिगत बाड़े में बंद कर लिया था। रूस के ज़ारतंत्र ने खुद को धीमे और यहाँ तक की छोटे-छोटे बदलावों को होने से भी रोके रखा।

बात अगर निकोलस द्वितीय की करें तो उसका चारित्रिक मनोदशा का एक अहम रोल था। अतः उसका परिक्षण करना लाजिमी और आवश्यक है। निकोलस द्वितीय उच्च रूप से शिक्षित, हार्ड-वर्किंग, और बेहद धार्मिक प्रवृत्ति का था। निकोलस को व्यक्तिगत रूप से जानने वाले व्यक्ति उसे बड़ा सहज और विनम्र बताते थे जो बेहिचक से लोगों से मिलता था। लेकिन वह अक्सर ही कमज़ोर व इनकन्सीस्टेन्ट साबित होता था, जैसा कि वह स्वयं अयोग्य व बुरे मंत्रियों को दण्डित नहीं कर पाता था और किसी और पर फैसला टाल देता था जिससे कि कई सारे चापलूस व मौकापरस्त दरबारियों के गुट बन चुके थे।

वह स्वयं के विद्वान और बुद्धिमान मंत्रियों को संदेह की दृष्टि से देखता था, उसकी इस मनोदशा का प्रमाण उसके दो सबसे होनहार मंत्रियों, विट्ट और स्टॉलिपिन, से डामाडोल सम्बन्ध बतलाते हैं। फिर, उसके सम्बन्ध में उसके निकट के मंत्रियों ने कुछ इस तरह से अपनी राय रखीं हैं:

“His character is the source of all our misfortunes. His outstanding weakness is a lack of willpower.”

  • Sergei Witte

“The Czar can change his mind from one minute to the next; he’s sad man; he lacks guts.”

  • Rasputin

“It was not a weakness of will that was the undoing of the last Czar but…a wilful determination to rule from the throne, despite the fact that he clearly lacked the necessary qualities to do so.”

  • Orlando Figes

तत्पश्चात निकोलस हमेशा से ही ऑटोक्रेटिक सिस्टम का घोर पक्षधर रहा और इसी सिस्टम को हमेशा चलाते रखने कि  उसकी मंशा जगज़ाहिर रही। उसने कहा कि “हमें ऑटोक्रेसी के सिद्धांत को उसी मजबूती व दृढ़ता से बचाना है जिस प्रकार से मेरे मरहूम पिता ने प्रबलता से किया था।“

ज़ार ने 1917 तक रूस को मिडिवल मुस्कोवी  की विचारधारा से प्रभावित साम्राज्य कठोरता के साथ तलवार की नोक पर चलाया। उसके राज्यारोहण शपथ के अनुसार ज़ार सार्वभौमिकता – संसद या कानून से परे, ब्यूरोक्रेसी या लोक मंतव्य से दूर, एकनिष्ठ (अब्सोल्युट) हैं। ज़ार सिर्फ ईश्वर के प्रति अपने विवेकानुसार गाइडेड होगा। वही कन्ज़र्वेटिव्स के अनुसार रूस के राष्ट्रीय स्वभाव के अनुसार ज़ार की ऑटोक्रेसी ही रूस के लिए सही है, ईश्वर-तुल्य ज़ार ही रूस के अनार्की-पसंद लोगों को कण्ट्रोल और डिसिप्लिन कर सकता है उन्हें सभ्य बना सकता हैं।

1905 – अक्टूबर मैनिफेस्टो

अपने सलाहकारों के दबाव और अपनी सत्ता खोने के डर में आकर ज़ार निकोलस द्वितीय अनमने ढंग से एक मैनिफेस्टो पर दस्तख़त करने को राजी हो गया। यह मैनिफेस्टो काउंट विट्ट के द्वारा तैयार किया गया था। मैनिफेस्टो प्रमुखतया चार बातों पर केंद्रित था, जो इस प्रकार हैं :

  • सिविल लिबर्टीज की घोषणा;
  • कैबिनेट गवर्नमेंट की घोषणा ;
  • लेजिस्लेटिव संस्था ड्यूमा में पापुलेशन के बड़े व बहुल निर्वाचक मंडल के आधार पर निर्वाचन।

हालांकि इसमें सरकार के तरफ से कुछ नया भी नहीं था, इन्ही अधिकारों अथवा सुधारों के लिए यूनियन ऑफ़ लिबरेशन कई सालों से रूसी शासन से भूमिगत होकर लड़ता हुआ आया था।  ख़ासकर यूनियन ऑफ़ लिबरेशन का यह पोलिटिकल प्रोग्राम था जिसकी आधारशिला पर लेफ्ट या उस वक़्त के मार्क्सवादियों की पूरी लड़ाई टिकी हुई थीं। इस मैनिफेस्टो के पीछे विट्ट की चातुर्य यह था कि वह इसके एवज़ में क्रांतिकारियों के लिबरल धड़े को पैसिफाई कर उनके विश्वास को वापस पा लिया जाय और लेफ्टिस्टों को उनसे अलग-थलग कर दिया जाय।

विट्ट सफल रहा, ठीक वैसा ही हुआ, उसकी समझ के मुताबिक़ जनता  ने खुले दिल से मैनिफेस्टो का स्वागत किया। 17 अक्टूबर 1905 को स्ट्राइक समाप्ति की घोषणा हुई और लोगों ने मैनिफेस्टो के अनुसमर्थन में सडकों पर जश्न मनाए। रूस में संवैधानिक लोकतंत्र तथा फ्रीडम के युग की शुरुवात की खुशी ने रुसी जनमानस को घेरा लिया था।

ज़ारवादी शासनक्रम के मित्रवत व लोकतान्त्रिक व्यवहार से प्रभावित होकर सोशलिस्ट नेता निर्वासन का जीवन समाप्त कर वापस रूस लौट आये। ड्यूमा के निर्वाचन में भाग लेने के लिए रूस में नयी-नयी पोलिटिकल पार्टीज की स्थापना होने लगी। इसी क्रम में ‘कैडेट्स’ (संवैधानिक लोकवादी) की स्थापना हुई जो मुख्यतः लिबरल-रेडिकल्स की पार्टी थी और वेस्टर्न मॉडल के नक्से-कदम पर चलते हुए रिफार्म की पैरोकार थी।

इसी तरह ‘यूनियन ऑफ़ द रूसियन पीपल’ पार्टी की स्थापना हुई जिसे खुले तौर पर ज़ार निकोलस द्वितीय के सपोर्ट हासिल था। यह पार्टी घोर राष्ट्रवादी व एंटी-सेमिटिक विचारों की पुरजोर समर्थक थी। इसके पैरामिलिटरी ग्रुप जिसका नाम ‘द ब्लैक हुंडरेड्स’ ने ज़ार शासनक्रम के ज़ानिब से क्रांतिकारियों से सडकों पर कई झड़पों में हिस्सा लिया था। निकोलस द्वितीय के ही शासनकाल में हुए यहूदियों के खिलाफ कुख़्यात नरसंहार में बढ़-चढ़कर भाग लिया था।

ज़ारवादी शासन क्या रिफार्म ला पाया?

ज़ार ने अक्टूबर मैनिफेस्टो में जिन रिफार्म की बात की थी वो अप्रैल 1906 में फंडामेंटल लॉज़ के नाम से कानून के तौर पर  सामने आये । चूकि ज़ार निकोलस द्वितीय की ऑटोक्रेटिक मनोवृत्ति को कॉन्स्टिटूशन के प्रयोग से सख़्त एतराज़ था तो लाजिमी रूप से अक्टूबर मैनिफेस्टो को फंडामेंटल लॉज़ की शक्ल में जनता के सामने लाया गया। पर इसी क्रम में ज़ार की अयोग्य दूरदर्शिता व राजनीतिक अपरिपक्वता साफ़ नज़र आती है जब वह अक्टूबर मैनिफेस्टो को कंस्टीटूशन का नाम देकर उसे वेस्ट के परम्परा के मुताबिक इस रिफार्म को सिंबॉलिक (जिसका राजनीतिक महत्व ज़्यादा होता हैं) बनाने के मौके को गवाँ बैठा।

हालाँकि मैनिफेस्टो प्रकरण के पश्चात कुछ वक़्त के लिए ऐसा जरूर लगा कि रूस में शांति और स्थायित्व की पुनः बहाली हो जाएगी। यह अलग बात है कि मैनिफेस्टो प्रोक्लेमेशन के ठीक बाद सडकों पर लोगों ने जश्न मनाया। यूफोरिया की लहर सर्वव्याप्त थी। आमलोगों में राष्ट्रीय एकता की भावना पूरे उफान पर थी। ज़ारवादी रूस के ऑटोक्रेटिक शासनक्रम में आमलोगों को मिली इस अभूतपूर्व जीत के बैनर तले लोगों में यह उम्मीद जगी थी कि शायद अब कही समाज का हर वर्ग क्लास के भेद मिटाकर एकजुटता प्रदर्शित करेंगे और एक-दूसरे का दुःख-दर्द समझेंगे। लोगों की उम्मीद कि क्लास के चपेड़े में फंसे समाज जो कई वर्गों में बटा हुआ है और जिनके बीच की खाई उन्हें ऑटोक्रेटिक, दमनकारी ज़ार के शासन को सफल और सख़्त चुनौती देने में विफल रहा है, अब दिन फिर जायेंगे और हम सब साथ मिलकर ज़ार को और अधिक रिफॉर्म के लिए मज़बूर करेंगे।

रूस की आम जनता की आमधारणा और मनोदशा को परिभाषित करने में साहित्य और कला भी बढ़-चढ़ कर सामने आया। ‘पब्लिक विक्ट्री’ की सार्वभौमिक प्रवृति को अभिव्यक्ति देते हुए बतौर ‘मैनिफेस्टो ऑफ़ 1917’ कर के इलिया रेपिन ने एक पेंटिंग बनाई जो बेहद मक़बूल रही।

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ये लोगों की बेशुमार खुशी का आलम ही था जिसमे हज़ारों लोगों का हुजूम सर्दीली बारिश के मौसम को धत्ता बताते हुए विंटर पैलेस के आगे ‘फ्रीडम ऑफ़ असेंबली’ अंकित लाल बैनर को लेकर अपनी जीत को जताया। इस तरह वो खुनी रविवार के कत्लेआम की ऑटोक्रेटिक मानसिकता पर मैनिफेस्टो के द्वारा अपने डेमोक्रेटिक संवैधानिक आदर्शों की जीत बता रहें थे।

पर जल्द ही यह धारणा छलावा साबित हुई और लोगों को अपने छले जाने और छद्मता में जीने का इल्हाम हुआ। उन्हें एहसास हुआ कि ये मैनिफेस्टो खोदा पहाड़ और निकली चिड़िया को चरितार्थ कर गयी। ठीक उसी वक़्त रुसी जनमानस को अपने भ्रान्ति में होने का भी भान हुआ। उन्हें यह एहसास होते देर नहीं लगी की ‘यूनिटी ऑफ़ पीपल’ महज़ भ्रामकता के सिवा और कुछ भी नहीं है। इसे निम्न तरीके से समझा जा सकता हैं –

मूवमेंट में अग्रणी भूमिका निभाने और उसको वैचारिक बल प्रदान करने में रुसी समाज का लिबरल धड़ा था जिसका प्रतिनिधित्व मुख्यतः रुसी समाज का संभ्रांत अथवा सामाजिक पायदान में ऊँचा रूतबा रखने वाले लोगों के द्वारा था। इस ऊँचे तबके की तमाम लड़ाई पूरी तरह से राजनीतिक थी और ज़ार निकोलस द्वितीय का मेनिफेस्टों उनके लिए उनकी राजनीतिक जीत। तमाम बातों का निचोड़ यह रहा कि मेनिफेस्टों की घोषणा लिबरल धड़े को संतुष्ट करने के लिए काफी रही और वे लेफ्ट या सोशलिस्ट या हिंसक क्रांतिकारियों के ख़ैरख़्वाह या पैरोकार नहीं रहे, और इस तरह से रूस का जनमानस बहुलतया से जिसके पक्ष (अधिक-से-अधिक राजनीतिक आज़ादी) में था उससे उनका सोच-विचार के स्तर पर कटाव हो गया।

रुसी संभ्रांत वर्ग अथवा समाज की ऊँची जमात का प्रतिनिधित्व करते उस वक़्त के मुख्यधारा के सभी अखबारों ने मेनिफेस्टों के तारीफों के कसीदे काटे। बड़ी बेबाकी के साथ उन्होंने ये एलान किया कि रूस भी अब उस यूरोपियन परिवार का हिस्सा बनने की दहलीज़ पर है जहाँ नागरिकों को संवैधानिक रूप से स्वतंत्रता प्राप्त है। रोचक बात यह कि मेनिफेस्टों के नव-युगांतर में अखबारों के ऊपर से कड़े सेंसर कानून की चौकीदारी को हटा लिया गया था अतः अखबारों की यह दिलनवाज़ी लाज़िमी थी।

ख़ैर, चलिए आपको मूवमेंट की कैनवास पर मेनिफेस्टों के ब्रश से बने दिलफ़रेब तस्वीर को और क़रीब से देखने की कोशिश करते हैं और उसकी भ्रामकता को पहचानते है। तस्वीर का पहला हिस्सा जो पहली नज़र में प्रखरता के साथ नज़रों को आकर्षित करता है में साफ़ तौर पर लिबरल धड़े की गहरी छाप नज़र आती है। लेकिन ठीक वही बारीकी से दौड़ायें तब पता चलता है कि पहली नज़र में ध्यान खींचती तस्वीर का प्रखर हिस्सा विभिन्न बारीक रंगों की रेकी-नुमा जाल में बिंधा हुआ है।

ठीक इसी तरह आंदोलन में ज़मीनी लड़ाई लड़ने वाला वर्ग – रुसी आम जनता – जिसका सबकुछ दाँव पर लगा गया था, जिसने यह आंदोलन करो या मरो की तर्ज़ पर लड़ा था, जिन्होंने आगे देखा न पीछे और अपना सर्वस्व लूटा दिया – उस रुसी आम जनता के लिए आंदोलन के बाद की ज़िन्दगी उनके आस के विपरीत छलावे के रंज और धोखे की पीड़ा से भरा पड़ा था। शासन के दुःसाहसी चालबाज़ी और कुलीनतंत्र के व्यवस्थावादिता के प्रति रुसी आम जनमानस के मन में ग़ुस्से की ज्वाला अंदर ही अंदर भभक रही थी।

बात अगर शहरी जीवन की करें तो वाक़ई परिवर्तन क्रन्तिकारी रहा। क्रन्तिकारी इसीलिए क्योंकि बदलाव मूलभूत था। सोशलिस्ट लीडर्स निर्वासन से लौट चुके थे, पोलिटिकल पार्टीज की चहल-पहल बढ़ गयी थी, वे चुनावों में भाग लेने की तैयारी करने लगी थी। आम सड़कें हो या भीड़-भाड़ वाले चौराहें या फिर कोई आम पार्क हर जगह लोगों के लिए राजनीतिक वाद-विवाद का केंद्र बन गए।

लेकिन ठीक इसके विपरीत रुसी आम जनता जिससे मेरा तात्पर्य रूस के आम वर्कर और खेती-किसानी करने वाले आम खेतिहर मज़दूर से है के लिए रुत में कोई बदलाव नहीं आया। मैनिफेस्टो के राजनीतिक रियायत श्रमिकों और खेतिहर मज़दूरों के लिए बहारों का मौसम लेकर नहीं आये। श्रमिकों, खेतिहर मज़दूरों अथवा यूँ कहें तो खेतिहीन किसानों के लिए बदलाव नदारद रहे – जिन्होंने अपनी जाने गवाँयी, जिस बिरादरी ने अपने चहेतों को पुलिसिया गोली से खाकनशीं होते देखा उनके लिए ज़िन्दगी बदस्तूर वैसी ही रही जैसा खुनी रविवार के पहले था।

श्रमिकों और खेतिहर मज़दूरों की मुख्य मांगे व्यक्तिगत होने के साथ-साथ सामाजिक भी थी और अतिरंजित होने का आरोप ना लगाए जाए तो ज़ाहिर तौर पर यह विचारों का अतिक्रमण करती हुई राजनीतिक भी थी। यह ज़ाहिर तौर पर राजनीतिक तौर पर खुद के पहचान को स्थापित करने की मुखर स्वरों में तार्किक और धमक-भरी कोशिश थी। वक़्त की धीमी अलाँव के सामने इतिहास के अहाते पर बैठकर आज इसकी व्याख्या करते वक़्त मुझे यह कहने में तनिक भी गुरेज़ नहीं है यह लड़ाई रुसी जनमानस के लिए अपने फंडामेंटल अधिकारों की लड़ाई थी।

  • आठ घण्टे का कार्य दिवस
  • मालिकों और नियोक्ताओं द्वारा सम्मानजनक व्यवहार
  • बेहतर वेतन व सेवा शर्तें

बस यही तो मांगे थी उनकी पर आज मामूली से दिखने वाले ये तीन बातें भी उस वक़्त के रूस में दूर की कौड़ी थी। अतः ज़ाहिर तौर पर शहरी लिबरल वर्ग के विपरीत श्रमिक व खेतिहर मज़दूर वर्ग के लिए यह महज़ एक शुरुवात भर थी। अक्टूबर के मैनिफेस्टो प्रकरण के बाद नए सिरे से हड़ताल और कृषक आंदोलन होना शुरू हुए जो अगले साल 1906 में भी जारी रहें।

मैनिफेस्टो के बाद लोगों का उत्साह इतने चरम पर था कि खेतिहर श्रमिकों को यह लगा कि मैनिफेस्टो ने उन्हें यह लाइसेंस दे दिया है कि उन्हें जो अच्छे नहीं लगते व उनकी बेधड़क अनदेखी करें। बात अगर सेना की करें तो आर्म्ड म्युटिनी की संख्या में अचानक से वृद्धि हो गयी। और, पहले की तुलना में अब आर्म्ड म्युटिनी का संख्या-बल और प्रभाव काफी बृहद हो चला –  अक्टूबर से लेकर दिसंबर के दरमियान सरकारी आकड़ों में दर्ज 211 अलग-अलग म्युटिनी इस बात की तस्दीक करते हैं।

मास्को का बलवा और लेनिन

इन्ही क्रन्तिकारी चिन्हों को पढ़ते हुए सोशल डेमोक्रेट्स (एस डी) जो उस वक़्त तक रूस में मार्क्सवादी विचारधारा का प्रतिनिधि करने वाली सबसे बड़ी और मजबूत पार्टी थी ने यह तय किया कि मास्को शहर में एक बड़ा और प्रभावी सशत्र बगावत को अंजाम दिया जायेगा। लेनिन भी इस मौके को पूरे तरह से भुनाना चाहता था। ट्रोट्स्की के नेतृत्व में पीटर्सबर्ग सोवियत भी पूरे जोशो-ख़रोश के साथ शो-डाउन की तैयारी कर रहा था। इसने सिलसिलेवार उपद्रवी या मिलिटेंट हमलों की हिमायत करने के साथ-साथ सशत्र आंदोलन द्वारा वर्किंग क्लास की प्रधानता (हेजेमनी) स्थापित करने के विचारों को लेकर माहौल बनाना शुरू कर दिया। 03 दिसंबर को पीटर्सबर्ग सोवियत के नेताओं को सशत्र विद्रोह का षड़यंत्र करने के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया।

इसी घटनाक्रम में मास्को एसडी ने अपने मंसूबों को अंजाम देते हुए मास्को शहर में जनरल स्ट्राइक की घोषणा करने के साथ-साथ कामगारों में हथियार बटवायें। तमाम शहर में पुलिस ने हर छोटी-बड़ी सड़क पर बैरिकेड लगा दिए और मॉस्को की सड़कें पुलिस और कामगारों के बीच ज़ंग के मैदान में तब्दील हो गयीं।

टेक्सटाइल उद्योग का केंद्र प्रेसनिआ जिला बागियों का गढ़ बना जहाँ बागियों ने खुद की क्रन्तिकारी परिषद् और मिलिशिया का गठन कर लिया था। अपनी नाक के नीचे होते इस नाक़ाबिले-बर्दाश्त घटना को सिरे से समाप्त करने के लिए तिलमिलाए ज़ार शासनक्रम ने हर-संभव रीएंफोर्रसमेंट भेजा। बर्बरता की सीमा-रेखा तब पार हो गयी जब तमाम प्रेसनिआ ज़िले के ऊपर बमबारी की गयी।

प्रेसनिआ पर हुए इस घृणित और घोर-निंदनीय बमबारी के फलस्वरूप हजारो मासूम और निहत्थे आम नागरिक बेमौत मारे गए। इस कुख्यात कुकर्म के बावजूद भी ज़ार प्रशासन की सत्ता की बदहवासी का ये आलम था कि विद्रोह को निर्ममता से दबाये जाने के बाद आने वाले सप्ताहों में पुलिस ने बिना किसी पुख्ता सबूत के लोगों को गिरफ्तार करना शुरू किया और सीधा-सीधा मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया। कामगारों के बच्चों को पुलिस ने बैरक्स में बंद किया और उनपर बेरहमी भरे ज़ुल्म ढायें ताकि उन्हें ‘पाठ पढ़ाया जा सके।’ शहरों में क़ैदियों से जेल भर गए, उग्रवादी गतिविधियों में संलिप्त कामगारों की नौकरियाँ उनके हाथों से छीन गयीं, फिर शासन के हाथों समुलता से उखाड़े जाने के डर से सोशलिस्ट पार्टियाँ भी भूमिगत हो गयीं। धीमे-धीमे ताक़त और आतंक के हाथो ही सही, ज़ार साम्राज्य में शांति और व्यवस्था की स्थापना हो गयी।

हालाँकि, रुसी जनमानस के ह्रदय में जो शोला भभक रही थी वो एक वक़्त के लिए आतंक और अत्याचार रुपी पानी के थपेड़ों से बुझ कर धुवाँ-धुवाँ ज़रूर हुई मगर उम्मीदों की अंगीठी में अभी भी आँच बाकी थी, वे राख नहीं हुई थी।

मॉस्को का यह बलवा 1905 के सोवियत कल्ट में एक महत्वपूर्ण आयाम की शक्ल अख्तियार करने वाला था। इस बलवा में शहादत को प्राप्त हुए बाँके लोग जिन्होंने अपने फौलादी जिगर में व्यवस्था परिवर्तन का जज़्बा लेकर ज़ारवादी शासनतंत्र से बेहिचक बिना डर-भय के लोहा लिया था, जिनको सोवियत ने ‘फालेन हीरोज’ की संज्ञा दी थी,  1917 में क्रांति के दिनों और तत्पश्चात गृह युद्ध के समय में जिनके क़ुर्बानी की कसमें खायीं जाती और उनकी वीरता को अनेकों तरीके से पूजा जाता। और ये सब उस वक़्त जब बोल्शेविकों को अपने लिए शहीदों की ज़रुरत महसूस हुई।

हर मानक से मॉस्को में हुआ यह बलवा कभी भी सफल होने के लिए नहीं था और ठीक इसी तरह से यह दुर्दांत रूप से असफल हुआ। पर मुद्दा कभी भी सफलता या असफलता का नहीं था। नेपोलियन के कथन ‘On s’engage et puis on voit!’ के मर्म को चरितार्थ करते हुए इस वैचारिक उद्देश्य से प्रभावित था कि ‘सत्ता हथियाने का जब भी मौका मिले तब ही उसपर अमल करते हुए कार्य करना चाहिए, भले ही कितना भी दुश्वार लगे करो चूकि धरातल पर करने से ही चीज़े बदलती हैं।’ और लेनिन ने इसी विचारधारा का उल्लेख करते हुए अक्टूबर 1917 की क्रांति का सञ्चालन किया।

1905 के तमाम घटनाक्रम और उनके नतीज़तन सीख

निःसंदेह ज़ारवादी शासनक्रम चरमरा चूका था पर अभी भी यह पूर्णतः चलायमान अवस्था में था। इसके कारक बेहद साफ़-साफ़ थे और कई सारे थे :-

सबसे पहले, कई सारे विद्रोही आंदोलन और उनके अलग-अलग संगठन – शहरी लिबरल वर्ग, कामगार, खेतिहर मज़दूर, सैनिक विद्रोह, और अंततः राष्ट्रवादियों का आंदोलन – सभी ने अपना-अपना राग अलापा और अपने-अपने तरीके अख्तियार किये जिसकी वज़ह से ये कभी-भी राजनीतिक एकजुटता नहीं दिखा पाए और अप्रभावी साबित हुए। हालांकि फरवरी 1917 में ठीक इसके उलट ड्यूमा और सोवियत ने सूझ-बुझ दिखाते हुए विभिन्न धड़ो और संगठनो में सामंजस्य बिठाने का काम किया और क्रान्ति का नेतृत्व करते हुए उसे सफल बनाया।

फिर दूसरे कारक के रूप में सामने आता है सैन्य बलों की वफ़ादारी। तमाम छोटे-बड़े, एक के बाद एक होने वाले हिंसक और बेहिसाब जान-माल की क्षति पहुँचाते अनेकों सैन्य विद्रोहों के बावजूद आलम ये रहा कि ज़ारवादी रूस के सैन्य बल अपने ज़ार के प्रति वफादार बने रहे और विद्रोहों और हिंसक आंदोलनों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। फिर, फरवरी 1917 में ठीक इसके विपरीत होता है। प्रथम विश्व युद्ध में झोंके जाने और बुरी तरह क्षत-विक्षत होने के पश्चात क्रांति के दिनों में जब बात एक पक्ष का साथ देने की बात आयी तो आर्मी और ननौसेना के बचे-कूचे अंग ने बड़ी फुर्ती के साथ लोगों के साथ कदमताल मिलाया।

तीसरे करक के रूप में पहचान होती है जापान के साथ हो रहे युद्ध या सैन्य झड़प का सापेक्षिक रूप से जल्द समाप्त हो जाना। यह सरकार के फायदे की बात साबित हुई और आगे और नुकसान होने से बचा लिया। अगर चीज़े थोड़ी भी मुख्तलिफ रहीं होती जैसे कि मानो रूस ने जापान के साथ सितम्बर में जो शांति संधि (पोर्ट्समाउथ की संधि) स्थापित की वो अगर ज़रा भी रूस के हितों के विपरीत थोड़े से भी ऊँचे शर्तों पर हुई होती तो ज़ार सेना का विश्वास खोने के साथ-साथ समाज के राष्ट्रवादी वर्ग में उसके प्रति जो मोह था उसको भी उसके प्रति घृणा और क्रोध में बदल कर खो देता।

चौथे और सबसे स्ट्रक्चरल श्रेणी का कारक – क्रांतिकारी खेमे के अंदर दो प्रमुख वर्गों के बीच खाई समान सोद्देश्यात्मक वैचारिक मतभेद का होना। जैसा कि अक्टूबर में मैनिफेस्टो के आने के बाद हुआ शहरी लिबरल धड़े की राजनीतिक लड़ाई मानो ख़त्म ही हो गयी, लेकिन ठीक इसके विपरीत लेफ्ट के लिए अभी यह लड़ाई की शुरुवात भर थी और वे मूलभूत सामाजिक बदलाव के पक्ष में थे। अक्टूबर मैनिफेस्टो की पनाह पाकर लिबरल धड़ा क्रांति की कहानी को गच्चा दे गया। ठीक वैसा ही हुआ जैसा कि ज़ारवादी उपक्रम का दावा था – उन्होंने मेनिफेस्टों की तेज़ छुरी से शहरी लिबरल धड़े और लेफ्ट की घोर व्यवस्था-परिवर्तनकारी धड़े के बीच के बीच के धागे को बड़ी चालाकी से काट दिया और लिबरल धड़े को अपने पक्ष में ना करते ही सही मगर उसे गैर-हानिकारक की श्रेणी में डाल दिया।

पर गौर करने वाली बात है कि इन सभी घटनाओं का सबसे घोर व तीक्ष्ण नतीजा यह हुआ कि रूस की जनता भविष्य में कभी भी दुबारा संवैधानिक व लोकतान्त्रिक आन्दोलनों की हिमायत या सरपरस्ती करती नज़र नहीं आई। रूस की जनता ने जिस तरह 1905 के जनवरी माह से लेकर दिसंबर महीने के बीच संविधानवाद और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में जिस तरह की तल्लीनता रुचि दिखायीं वो आज तक के इतिहास में फिर नदारद रही, गैर-वजूदन रही।

हाँ परन्तु इसका एक सिरा हमें एक खालिस सच भी बतलाता है और जो कि ज़ाहिर भी है, जायज़ भी है और वो ये कि ज़ारवादी सत्ता-प्रतिष्ठान लोगों की ज़हालत और ग़ुरबत भरी ज़िन्दगी की नुमाइंदगी करती क्रांति को अपने तमाम सरकारी उपक्रमों को झोंक-कर येन-केन-प्रकरेण आतंक और हिंसा के सहारे दबा तो दिया, पर जनमानस का ज़ार के प्रति सम्मान और प्रेम सब कुछ जाता रहा। लोगों का ज़ार के ऊपर से भरोसा मिट चूका था , सदा के लिए दफन हो चूका था। जनता ने आज़ादी की खुशबू महक़ ली थी, उन्होंने ख़ालिस आज़ादी का स्वाद चख लिया था जिसका चटक स्वाद उनके ज़ेहन में उतर चूका था। वो अब कभी भी 1905 से पहले की आबो-हवा में नहीं जी सकते थे। वे अब पहले से ज्यादा जज़्बेदार और साहसी नज़र आ रहे थे, अगर ज़ार रिफार्म को तरजीह न देते हुए उसको नज़रअंदाज़ करता है तो वे ज़ार की मुखालफत करने को हर वक़्त तैयार थे।

महज़ कुछ ही सालों बाद ठीक यही साबित हुआ। लोग मानो 1917 का इंतज़ार कर रहे थे। कई इतिहासकारों और यहाँ तक कि रुसी क्रांति के नायक माने जाने वाले लेनिन समेत रूस में उन्वान-ओ-उरोज़ में आये उस वक़्त के कला व साहित्य में भी इसी बात की तस्दीक हुई है कि हर मायने से 1905 की क्रांति – प्रथम क्रांति – फोर्मटिव सीख के लिए थी या यूँ कहें तो रूस के आगे के कालक्रम में साबित होती हुई नज़र आयी।

बोल्शेविकवाद: लेनिन व ट्रोट्स्की की नीति

हालाँकि 1905 की मूवमेंट क्रन्तिकारी रही मगर ज़मीन पर बदलाव नदारद रहें। कुलीनों की भूमि जिसपर वो कई पीढ़ियों से श्रमिकों से भी बदतर हालात में गुलामों की भांति किसानी करते आये थे को अपने मालिकाना हक़ में नाकाम खेतिहर मज़दूरों  की फ़्रस्ट्रेशन ज़ाहिर होने लगी थी। जेन्ट्री या रूस का कुलीन वर्ग अब डर-सहम के रहते थे चुकि जब उनके पुराने श्रमिक खेतों पर वापस लौटे तो उनकी नाराज़गी अनेकों रूप से ज़ाहिर हो रही थी, नौजवान खेतिहर किसानो में व्यवहार परिवर्तन प्रबल रूप से हावी था। खेतिहरों को इस बात का इल्हाम हो चला था कि भले ही हमारे स्वरों को निर्ममता से दबा दिया गया हो पर अगर हम एक जुट रहें और अपने इरादों का परचम लहराये रहें तो वो दिन दूर नहीं जब इस धृष्ट घुन्न और बर्बर ज़ारवादी शासनक्रम को घुटने टेकने पर मज़बूर कर देंगे। ठीक इसी फलसफे को ध्यान में रखते हुए पीजेन्ट्स या खेतिहर मज़दूर वर्ग ने नरमी दिखाने के बजाये घायल शेर की तरह घुर्राना ज़ारी रखा और जेन्ट्री या कुलीन वर्ग के मन-मष्तिस्क पर अपने हूलिगनपने दहशत में जीने को बेबस कर दिया। खेतिहरों की धृष्टता के सामयिक प्रमाण के तौर पर उनके द्वारा अपने मालिकों के साथ रिश्तों में आये बदलाव से लिया जा सकता है जिसमे श्रमिकों के तरफ से पुराने सम्मान व आदर भाव के बजाय रोषजनक क्षुब्धता थी।

ये क्षुब्धता उस वक़्त के ग्रामीण गीतों में भी सुनाई देने लगे थे, इसी सुर में राग मिलाते हुए 1912 का एक गीत कुछ इस प्रकार है :-

At night I strut around,

And rich men don’t get in my way.

Just let some rich guy try,

And I’ll screw his head on upside-down.

इन जैसे गीतों के माध्यम से पीजेन्ट्स ‘आज़ादी के दिनों में’ अपनी ज़मीनों पर मिली छोटे दिनों की मिल्कियत को वापस छोड़े जाने का विरोध प्रगट करते थे। इस तरह की तमाम गतिविधियों जिनमे की खेतिहर श्रमिकों अपने भूमि-मालिकों की ज़मीनों और सम्पत्तियों पर तोड़-फोड़ और गुंडई दिखा कर वे इस बात तस्दीक दिला  रहे थे कि ये ज़मीनें जिनपर तुम कुलीनों ने अपने सुख-सुविधाओं का साम्राज्य खड़ा किया है और हमें ग़ुलामों की तरह जीने को मज़बूर किया है को आख़िर ज़ारवादी शासन के कमजोर पड़ते ही उखाड़ फेंक दिया जायेगा।

और केवल ग्रामीण ‘स्कवायर’ भद्रलोक ही अकेले नहीं थे जिन्हे निम्न वर्गों के तरफ से आने वाले ‘व्यवस्था-परिवर्तनकारी’ तबाही का भय सता रहा था। बल्कि शहरी कुलीन वर्ग को भी खतरनाक हिंसक क्रांति का आतंक उन्हें खाये जा रहा था; उन्हें ये डर सतायें जा रहा था कि क्रांति  की पुनरावृति फिर से होने को है और अबकी बार और भी बदहवासी के साथ,और भी हिंसा के साथ तबाही का मंज़र ज्यादा भयावहता लिए हुए था। डर और आतंक की मनोदशा यह भी संकेत कर रही थी की आने वाले कल की क्रांति स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्वता का सेलिब्रेशन नहीं करेगा।

मनोदशा में यह बात प्रखर रूप से ज़ाहिर हो रही थी कि आने वाले क्रांति में बदहवासी भरी हिंसा होगी, सदियों से उबलती आ रही नाराज़गी अपने साथ बर्बादी के झंझावातों को साथ ले आएगी जो अपने साथ सदियों पुरानी इम्पीरियल सभ्यता को शून्य में विलीन कर जाएगी। कुछ इसी तरह का घातक मंजर ‘ब्लोक’ व ‘बेली’ जैसे उस वक़्त के मशहूर कवियों की कविताओं में दीखता है जिन्होंने 1905 के बाद के रूस को एक जागृत व अस्थिर ज्वालामुखी से जोड़ कर दिखाया।

आज जब 1905 के घटनाक्रमों व तथ्यों की जांच-पड़ताल होती है तो एक बात साफ़ तौर पर नज़र आती है – बोल्शेविकों का क्रांति से सीधे-सीधे तौर फायदा होना। बोल्शेविक एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटक के तौर पर तभी उभर पाए जब लेनिन, जो क्रांति के वक़्त निर्वासन में यूरोप में था, ने असफल क्रांति के महत्वपूर्ण व अमल में लाये जाने वाले पक्षों को आत्मसात कर लिया।

1905 से पहले तक सोशल डेमोक्रेटिक धड़े में मतभेद केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही थे – जहाँ बोल्शेविकवाद लेनिन से व्यक्तिगत निष्ठता की मांग करता था वही मेंशेविकवाद किसी भी एक व्यक्ति के प्रति निष्ठा और या किसी डोमिनेंट लीडर की धारणा के खिलाफ था।

लेनिन के मतानुसार, 1905 की असफल क्रांति ने तीन बातों को संदेह से परे सिद्ध कर दिया। पहली बात, बुर्जुवा और उनकी लिबरल पोलिटिकल पार्टीज का वैश्वासिक दिवालियापन का होना जो कभी भी एक राजनीतिक घटक के तौर पर ऑटोक्रेसी के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता है। दूसरी प्रमुख बात खेतिहर श्रमिकों में बेशुमार क्रन्तिकारी पोटेंशियल का होना। और अंतिम बात, सीमांत क्षेत्रों में होने वाले राष्ट्रवादी आंदोलनों में सम्पूर्ण साम्राज्य को हिला कर रख देने की क्षमता का होना।

इन्हीं विश्लेषणों के फलस्वरूप लेनिन आश्वस्त हो पाया कि बोल्शेविक (ऑर्थोडॉक्स मार्क्सवादी विचारधारा का मातंरित स्वरुप की एक धारा) विचारधारा को आगे बढ़ाने का हौसला मिल पाया। बोल्शेविकवाद के अंतर्गत लेनिन का मत यह था कि एक दिन वर्किंग क्लास का ‘वैनगार्ड’ सत्ता को हथिया लेगा और एकबारगी में बिना किसी बुर्जुवा-डेमोक्रेटिक का हाइफ़नेटेड आयाम जोड़े एक सफल सोशलिस्ट क्रांति ले आएगा।  हालांकि एक शर्त ये भी था कि ये तभी संभव हो पायेगा जब वर्किंग क्लास ग्रामीण खेतिहरों और अन्य नेशनालिटिज को साथ लेकर चले जिनमे ये क़ुव्वत है कि वो ज़ारवादी शासनक्रम को धराशायी कर दें।

ट्रोट्स्की ने भी जो ‘परमानेंट रेवोलुशन’ के नाम से जो थ्योरी प्रतिपादित की वो भी लेनिनवादी विचारधारा के नज़दीक मालूम होती है। ट्रोट्स्की का ‘परमानेंट रेवोलुशन’ भी 1905 की घटनाओं के विश्लेषण का ही परिणाम था जिसमें उन्होंने ये निष्कर्ष निकला कि रुसी बुर्जुवा एक सच्चे लोकतान्त्रिक क्रांति लाने में असक्षम है, क्रांति की लीडरशीप करने के लायक भी नहीं है। पर ये अलग बात है कि बुर्जुवा की नाकामियों ने ही ये रास्ता निकाला की पिछड़े रूस में वर्किंग क्लास वेस्ट की एडवांस्ड सोसाइटीज़ से पहले सोशलिस्ट क्रांति ला सके। फ़र्क ये है कि  मार्क्सवादी धारणा के मुताबिक़ ये एक बारगी में संभव होने के बजाय क्रमिक रूप से होगा जिसमे बुर्जुवा के नेतृत्व में एक लोकतान्त्रिक क्रांति होंगी और तत्पश्चात क्रमवार ढंग में सोशलिज्म डेवेलप होकर उभरेगा।

ट्रॉट्स्की का यह सोचना था कि रूस में एक ‘वर्कर्स स्टेट’ कभी भी सरवाइव नहीं हो पायेगा; वह कैपिटलिस्ट देशों के साँझे व एकीकृत प्रतिरोध को कभी भी झेल नहीं पायेगा। रूस में वर्कर्स स्टेट के सफल होने की पूर्वशर्त ये होगी कि आंदोलन का अंतराष्ट्रीय प्रसार हो – आंदोलन का सर्वहारा और खेतिहरों के गठजोड़ से दूसरे राष्ट्र-राज्यों में फैलने शक्ति ही ये तय करेगी की कि  रूस में ‘वर्कर्स स्टेट’ किस हद तक सफल रहता है। फिर, पूंजीवादी व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए आंदोलन में सर्वहारा व खेतिहरों का गठजोड़ एक स्थायी पूर्वशर्त होगी।

हालाँकि ट्रोट्स्की अभी भी एक मेन्शेविक था मगर उसकी प्रतिपादित विचारधारा बोल्शेविज़्म के खांचे में ज्यादा सटीकता से बैठती थी। ऑर्थोडॉक्स मार्क्सवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली मेंशेविज़्म की विचारधारा

हालांकि ट्रोट्स्की अभी भी मेंशेविक धड़े का एक प्रमुख चेहरा था, मगर 1917 में उसके द्वारा प्रतिपादित यह विचारधारा बोल्शेविज़्म के खांचे में ज्यादा सटीकता से फिट बैठती है, जबकि ऑर्थोडॉक्स मार्क्सवादी विचारधारा का प्रतिबिम्ब मेंशेविज़्म का इस बात पर ख़ासा जोर था कि रूस जैसे अंडर-डेवेलप्ड या पिछड़े या अविकसित देशों को सर्वप्रथम बुर्जुवा-लोकतान्त्रिक फेज से गुज़रना होगा तदन्तर में जहाँ पोलिटिकल और सिविल राइट्स के आभा-मंडल में एक रिएक्टिव प्रोसेस के तहत लेबर पार्टीज और ट्रेड यूनियनों का गठन, परिवर्द्धन व सम्पोषण होगा, और फिर यह जाकर इस डेमोक्रेटिक फेज में सोशलिस्ट क्रांति के बीज का काम करेगा।

इस बात में कोई संशय नहीं है कि लेनिन और ट्रोट्स्की ने अपने तमाम क्रन्तिकारी टैक्टिक्स, तरीके, सबक और वो सबकुछ जो 1917 के सफल क्रन्ति में वो अलम में लाते हैं वो उन्होंने 1905 के असफल बलवे से ही सीखा था। और, ठीक इसी को स्वीकारते हुए लेनिन का वो प्रसिद्ध बयान जिसमे लेनिन 1905 के क्रांति को 1917 का ‘ड्रेस रिहर्सल’ बताता है ‘जिसके बिना 1917 की क्रांति कदापि संभव नहीं हो पाती।’

स्टॉलिपिन व ज़ारवादी रूस में बदलाव की बयार कहाँ तक सफल रहीं ?

अक्टूबर मैनिफेस्टो के वाक़ये के बाद 1906 में ज़ार ने ‘फंडामेंटल लॉज़’ की उद्घोषणा की और ऑटोक्रेटिक रूस में भले ही थोड़े व अधूरे संकल्पों के साथ मगर लोकतंत्र का श्रीगणेश हुआ। ड्यूमा के लिए इलेक्शन हुए और रूस में लोकतान्त्रिक-संसदीय युग का सूत्रपात हुआ, सत. पीटर्सबर्ग शहर के आइकोनिक ज़ार की सत्ता के प्रतीक से ज्यादा रूस में ऑटोक्रेटिक रेमिनोवियन साम्राज्य और सभ्यता का प्रतिबिम्ब विंटर पैलेस के कोरोनेशन हॉल में ड्यूमा की आधिकारिक शुरुआत हुई। यह युग का परिवर्तन था, सदियों से चली आ रही सभ्यता में आमूल-चूल परिवर्तन का संकेत था। सभ्यता जो जड़वत हो चली थी, सभ्यता जो भूत की यादों में जकड़ी हुई थी, सभ्यता जिसने अपना प्रवाह भूला दिया था, सभ्यता जिसने एक ज़माने से एक ही ऋतु को पकड़ के रोके रखा था, उस सभ्यता के नाश होने का वक़्त आ चूका था, समय जो नाश भी करता है, का आगमन हो चूका था, काल ने दस्तक़ दे दी थी।

कुछ यूँ था मंज़र उस दिन – कोरोनेशन हॉल के अंदर एक तरफ महान रुसी साम्रज्य व सभ्यता, जो जड़ हो चली थी, की अगुवानी करते हुए खुद को महान और खासम-ख़ास कहलवाने वाले ऑटोक्रेटिक रूस के नुमाइंदे थे : तमाम मंत्रीगण, सीनेटरगण, एडमिरल्स, जनरल्स, और राजदरबार के सदस्यगण – सभी अपनी वर्दियों में मौजूद थे, वर्दियाँ जो सुनहरे ब्रैड्स और मेडल्स से सजी हुईं थी।

ठीक उनका सामना कर रहीं पंक्ति में नए रूस की नुमाइंदगी करते हुए लोकतान्त्रिक रूस का प्रतिनिधित्व कर रहे संसदीय डेप्युटीज़ मौजूद थे। जहाँ खेतिहर मज़दूरों की एक श्रृंखला जो रंग-बिरंगे सूती कुर्ते व टूनिक्स पहने हुए थे वही पेशेवर लोग लाउन्ज सूट पहने हुए थे।  मॉन्क्स और प्रीस्ट्स काले लिबास में थे, उक्रेनी, पोल, आर्मीनियाई व टाटर लोग अपने-अपने राष्ट्रीय लिबासों कोरोनेशन हॉल की शोभा बढ़ा रहें थे। हालांकि कुछ कुलीन भी मौजूद थे परन्तु एक भी वर्कर मौजूद नहीं था।

सदियों की अदावत का इतिहास लिए तथा रूस के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने के घोर बिंदुओं की मेखला समेटे कोरोनेशन हॉल, रूस के ज़ारवादी शासन का प्रतीक विंटर पैलेस, से ही रूस के ऑटोक्रेटिक साम्राज्य के ध्वस्त होने की गाथा बुन रहा था, साक्षी बन रहा था।

1905 से लेकर 1917 तक की कहानी और कोरोनेशन हॉल में वक़्त की अलामत में रूस के दो हक़ीक़तों के आमने-सामने होने की कहानी एक-सी है; ये कहानी रूस में राजशाही के पुरजोर समर्थकों और संसदीय संस्थानों की एडवोकेसी करने वाले दो विपक्षी गुटों की है। कहानी की शुरुआत कुछ ऐसी है कि ज़ारवादी रूस जब क्रन्तिकारी सदमे से उबरने की कोशिश कर रहा था तब ज़ारवादी तंत्र ने ड्यूमा को अधिकाधिक अधिकार देने की कोशिश कर उन्हें शांत करने की कोशिश की पर जैसे-जैसे क्रांति की यादें समय की कोख में समाती चली गयी वैसे-वैसे ड्यूमा से अधिकार वापस छीने जाने लगे और वही पुरानी ऑटोक्रेसी की रिविज़निंग होने लगी।

हालांकि ये भी सत्य है कि 1905-1906 के संसदीय सुधार इतने उभयकारी या ओपन-एंडेड थे कि उनसे दोनों ही पक्षों को अपने-अपने हिस्से की उमीदों सजों कर रखने का औचित्य नज़र आ रहा था। पर यह दोमुँहापन थोड़े दिनों का ही मेहमान सिद्ध हुआ और  जल्द ही रुसी आमजनों को ज़ार के बदलाव के कौल में छलावे का इलहाम हुआ। फंडामेंटल लॉज़ में साफ़ तौर पर ऐसे प्रावधान थे जो ड्यूमा की सत्ता का अंग न मानकर उसे दोयम दर्जे की आनुषंगिक सभा बना देते थे। अप्रैल 1906 में पारित हुए फंडामेंटल लॉज़ में वेस्टर्न कोंस्टीटूशनल मानकों का अवलोकन करते ऐसा कुछ भी  नहीं था कि जिससे यह साफ़ हो पाए की ज़ार अपनी सत्ता रुसी जनता से प्राप्त करता है और सत्ता का केंद्र जनता है तथा जनता प्रतिनिधियों को सार्वभौमिक मतदान अगर ना भी तो सिमित निर्वाचन के माध्यम से ही चुनती है, जिनके द्वारा बनाये गए कानून ही शासन हेतु इष्ट व अनंतिम होंगे।

फंडामेंटल लॉज़ में ज़ार ने अपने नाम के आगे ‘ऑटोक्रेट’ की उपाधि बरक़रार रखी केवल इतने से बदलाव के साथ कि ‘अनलिमिटेड’ के बजाय उसने ‘सुप्रीम’ प्रीफिक्स लगा लिया। जैसा कि विदित है ज़ार किसी भी हालत में अपने ‘कोरोनेशन ओथ’ से लेशमात्र हटने की सूरत में नहीं था, जिसमे वह खुद को रूस में ऑटोक्रेसी का संरक्षक घोषित किये हुए होता हैं।

बिना किसी परिमार्जन व बदलाव के राजदरबार ही राजनीतिक शक्ति का केंद्र-बिंदू बना रहा। ज़ार ने इवान गोरेमीकिन की प्रधानमंत्री के तौर पर नियुक्ति करने के साथ-साथ मंत्रिपरिषद की भी नियुक्ति की। इसके अलावे ज़ार फंडामेंटल लॉज़ के आर्टिकल 87 का उपयोग करके ड्यूमा को डिसॉल्व कर सकता था और इमरजेंसी डिक्री के प्रावधान से बिना रोक-टोक के राज-काज चला सकता था, जब ड्यूमा सत्र में न हो। इसके ऊपर ड्यूमा के सदस्यों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष प्रणाली द्वारा हुआ था जो कि साफ़ तौर पर राजदरबार के विश्वासपात्रों को चुनने के लिए खास तौर पर गढ़ी गयी थी।  फलतः ड्यूमा में कोर्ट की चापलूसी करने वाले, कुलीन वर्ग के नुमाइंदे, व कृषकों से भरा पड़ा था। हालांकि ये अलग बात है कि हक़ीक़त से विपरीत ज़ार तंत्र ने गलती से कृषकों को ज़ार का मित्र मान लिया था। सबसे महत्वपूर्ण बात, लेजिस्लेटिव पार्लियामेंट होने के बावजूद ड्यूमा स्वयं कोई कानून बिना ‘अपर चैम्बर’ के स्क्रीनिंग व इंडोर्समेंट के पास नहीं कर सकती थी जो कि अरिस्टोक्रेसी का गढ़ मानी जाती थी।

ड्यूमा का गठन और संवैधानिक सुधारों की एडवोकेसी

ज़ारवादी तंत्र के सोच-समझ के विपरीत, इलेक्टोरल लॉ के मुताबिक जो बारगेनिंग सरकार ने की थी उसके अनुसार ड्यूमा का गठन कहीं ज्यादा ही रेडिकल साबित हुई। टॉरिड पैलेस के प्रांगण में ड्यूमा का उद्घाटन सत्र जबरदस्त रिटोरिकल बयानबाजियाँ हुईं और ऑटोक्रेसी को घृणित-तिरष्कृत करते हुए तमाम तरह के उपमा-अलंकारों द्वारा अरिस्टोक्रेसी के किले को शाब्दिक और भाविक तौर पर ढाया गया। खैर, ये तो महज़ ज़ायका भर था, असली तड़का तब लगा जब ओपनिंग सेरेमनी में क्रांति को ट्रिब्यूट दिया गया और अरिस्टोक्रेसी को कोसा गया।

हालांकि सोशलिस्ट रिपब्लिक्स और सोशलिस्ट डेमोक्रेट्स ने इलेक्शन का बॉयकॉट यह कह कर किया था कि यह लोकतंत्र के नाम पर ज़ार का ढकोसला है। पर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी कोंस्टीटूशनल डेमोक्रेट्स (कैडेट्स), जिसने 448 सीटों में से 153 सीट्स अपने नाम किये थे, ने अपने तल्ख़ तेवर ज़ाहिर करना शुरू कर दिया। कैडेट्स पार्टी ने रेडिकल बदलाओं की पुरजोर सिफारिशें करना शुरू कर दिया।

कैडेट्स के मांगों में निम्न बातें शामिल थी –

  • ड्यूमा के प्रति उत्तरदायी सरकार की व्यवस्था हो;
  • स्टेट कॉउन्सिल को उन्मूलित कर दिया जाए;
  • तथा, सर्वभौमिक व्यस्क पुरुष मताधिकार का प्रावधान किया जाए;

किसानो-खेतिहरों की जनाधार वाली पार्टी, ट्रूडोविक्स (लेबोरिट्स), जो ड्यूमा में संख्याबल में दूसरे नंबर पर आती थी ने बृहत भूमि-सुधारों की मांग करना शुरू कर दिया। इसके सदस्यों ने उद्घाटन सत्र में सस्ता तंबाकू पीया और टॉरिड पैलेस के शानदार राजशाही फर्श पर सूरजमुखी के बीजों को चबाकर थूँका। मेरा ऐसा विश्वास है कि राजनीति में सिम्बोलिज्म की कहानी जब लिखी जाएगी तब रुसी इतिहास के इस पन्ने को ख़ासा तरजीह दी जाएगी जिसमे खेतिहरों की नुमाइंदगी करने वाले कैडेट्स पार्टी के ज़ानिब से ड्यूमा के उन सदस्यों द्वारा खेतिहरों की राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक ताना-बाना बताती उस घटना को सबसे गूढ़ लेकिन प्रत्यक्ष सिंबॉलिक कलेवर के लिए याद किया। जायेगा।

ट्रूडोविक्स ने भी बदलाव को लेकर अपना रुख ज़ाहिर करना शुरू कर दिया, उनकी एकमेव प्रमुख मांग थी :-

  • जेन्ट्री के तमाम जायदादों को कंपल्सरी तौर पर एक्सप्रोप्रिएट किया जाए और उनका पुनर्वितरण किया जाये।

कैडेट्स जिनकी यह मांग थी कि भूमि-मालिकों को मुआवज़ा दिया जाए ने ट्रूडोविक्स के साथ मिलकर ड्यूमा में उन्होंने भूमि-सुधार हेतु बिल पेश किया।

हालांकि एक वक़्त ऐसा भी था जब 1905 में क्रांति की धधकती ज्वाला से डरे-सहमे भूमि-मालिकों या जेन्ट्री किसी एक स्वरुप में एक्सप्रोप्रिएशन के लिए तैयार भी हो चुके थे। यहाँ तक कि प्रतिक्रियावादी डी. एफ. ट्रेपोव, जो कि ज़ार का मुख्य कृषकीय सलाहकार था, ने विट्टे से ये तक कहा था कि मैं सम्पूर्ण ज़मीन-जायदाद में से आधा छोड़ने को तैयार हूँ अगर वह मेरे बाकि के सम्पति की मेरे साथ बने रहने की गारंटी बनता है। पर ज्यों-ज्यों क्रांति का ख़तरा होता गया त्यों-त्यों जेन्ट्री अपने रुख में तल्ख़-मिज़ाजी लाते गए।

‘द यूनाइटेड नोबिलिटी’ – भूमि-मालिकों का एक संगठन जिसका कोर्ट, स्टेट कौंसिल, व सिविल सेवा में प्रबल समर्थन करने वाले कई लोग थे – ड्यूमा के भूमि-सुधार प्रयासों के खिलाफ में मजबूत अभियान चलाया। हालांकि उनके अभियान में नपी-तुली आर्थिक भाषा का प्रयोग था, इनका कहना था कि खेतिहरों को और अधिक ज़मीन देने से उनकी गरीबी व अन्य समस्यायों का निदान नहीं हो पायेगा। उनके कहे मुताबिक़ खेतिहरों की सारी समस्यायों की जड़ ग्रामीण कम्यून की अक्षमताओं में है न कि ज़मीनों का कम होना।

ड्यूमा की तरफ से जिन भूमि-सुधारों की  मांग की जा रही थी प्रवृत्ति में वो रुसी साम्राज्य की वैचारिक नींव हिलाकर रखने वाली थी। ज़ार निकोलस द्वितीय के लिए ये किसी भी तरह से गैर-बर्दाश्त था, फलतः उसने 8 जुलाई को ड्यूमा भंग कर दी। ज़ार के इस निरंकुश व गैर-मर्यादित आचरण को  संसदीय अस्तित्व व लोकतान्त्रिक गरिमा पर हमला मानते हुए तमतमाए कैडेट्स ने एक फिनिश प्रान्त के मैनिफेस्टो की घोषणा की। मैनिफेस्टो के ज़ानिब से उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे एक बार फिर बड़ी संख्या में जुटकर सिविल अवज्ञा करें ठीक वैसा ही जैसा उन्होंने 1905 के जनरल स्ट्राइक के दिनों किया था।

पर कैडेट्स वक़्त के मारे साबित हुए, लोगों ने वीबोर्ग मैनिफेस्टो को खासा तवज़्जो न दी। नतीज़तन, बिना आमलोगों के सपोर्ट के सरकार को भी सख्ती से निपटने का बहाना मिल गया और कुछ सैकड़ों की संख्या में कैडेट्स पार्टी के सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया।साथ-ही-साथ, कैडेट्स के अंग्रिम पंक्ति के नेतृत्व पर मुक़दमा चलाया गया और उन तमाम सदस्यों को ड्यूमा से बर्ख़ास्त भी किया गया। इस घटना को इतिहासकार चाहे जिस ही सांचे में रखना चाहें पर कैडेट्स अपने बाकी के राजनीतिक करियर में ‘आमजन’ के ऊपर कदापि अपना विश्वास नहीं रखने वाले थे।  कैडेट्स ने ये भी स्वीकार कर लिया कि वे आमजनों से कटे हुए हैं, खुद को ‘आमजन’ का नेतृत्वकर्त्ता होने का दावा करना उन्होंने त्याग दिया। ज़ाहिर तौर पर इस घटना के पश्चात कैडेट्स ने अपनी हदें पहचान ली और फिर वे वही बने रहें जो वो थे – मिडिल क्लास के नुमाइंदे। ‘लिबरलिज़्म’ और ‘आमजन’ अपने-अपने रास्ते चल पड़े, जैसे उनका कभी वाबस्ता ही न रहा हो।

पेट्र स्टॉलिपिन का आगमन और रिफ़ॉर्म

ड्यूमा के क्रन्तिकारी प्रतीत होने वाले लैंड रिफ़ॉर्म अभियान को समाप्त करने के बाद ज़ार ने एक नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति की – पेट्र स्टॉलिपिन। पेट्र स्टॉलिपिन अपने ‘नो-नॉनसेंस’ इमेज के लिए विख्यात थे। स्टॉलिपिन ख़ासकर तब चर्चा में आये थे जब इन्होंने अपने सारटोव प्रोविन्स की गवर्नरशीप के दौरान जब 1905 में हिंसक दंगे शुरू हुए थे तो कड़ाई के साथ लॉ-आर्डर लागू करवाया। यह तब और महत्वपूर्ण था क्योंकि ग्रामीण हलकों में बेहिसाब हिंसा करने वाले दंगाइयों से प्रशासन को पार पाना बेहद मुश्किल नज़र आ रहा था। ऐसे में स्टॉलिपिन ने अपनी प्रशासनिक दक्षता और नेतृत्व की चतुराई दिखाते हुए सभी हिंसक और प्रभावशाली उपद्रवियों के ऊपर कड़ाई से चाबुक चलाया। सारटोव के ग्रामीण इलाकों में उपद्रवियों को अलग-थलग करते हुए दमनकारी प्रशासनिक चक्र चलाया, और इस तरह स्टॉलिपिन अपने प्रान्त में रूस के अन्य किसी भी प्रान्त से ज्यादा शांति-व्यवस्था स्थापित करने में सफल हुआ था।

ज़ाहिर तौर पर सारटोव प्रान्त में स्टॉलिपिन के काम से प्रभावित ज़ार स्टॉलिपिन को बेहद सम्मान के साथ देखता था। स्टॉलिपिन को जो ज़ार द्वारा सम्मान प्राप्त हुआ था उसी से क्रम में उसने ज़ार का वैचारिक विश्वास भी जीता था। और इसकी परिणति ये हुई की ज़ार ने स्टॉलिपिन को समूचे रूस को संभालने की ज़िम्मेदारी दे दी और प्रधानमंत्री के तौर पर नियुक्त कर दिया। पेट्र स्टॉलिपिन तमाम रूस में अपने तरह के एकलौते ऐसे व्यक्ति थे जिनकी पकड़ राजनीति व प्रशासन के साथ-साथ सुधारों पर भी थी। ज़ारवादी रूस के सत्ताक्रम में उनकी छवि एक ऐसे अलहदा व्यक्ति की थी जो शक्ति-सत्ता के महज़ वंशानुक्रम ढाँचे की वज़ह से पॉवर-सेंटर में नहीं थे बल्कि इसलिए भी की वो एक राजनेता का दिल-ओ-दिमाग भी रखते थे। एक कड़े प्रशासक होने के साथ-साथ वो यह साफ़-साफ़ समझते थे कि अग्रेरियन रिफॉर्म्स को अधिक देर तक रोक कर  नहीं जा सकता है और अगर जनमानस की इक्षा के विपरीत सुधार नहीं होते है तो निःसंदेह क्रांति की पुनरावृत्ति होगी जिसमे सारा तंत्र बिखर कर रह जायेगा।

पर ठीक यही पर स्टॉलिपिन की छवि बेहद कंट्रोवर्सिअल या विवादास्पद भी है, स्टॉलिपिन रूस के उन गिने-चुने लोगों में शामिल है जो जनता को ध्रुवों में बाँटने की क्षमता रखते हैं। रुसी लेफ्ट ने उन्हें ज़ारवादी शासन-प्रणाली का सबसे प्रबल और ख़ूँख़ार हिमायती बताया। इस बात के पुख़्ता प्रमाण भी मिलते हैं – इस बात की तस्दीक उनसे की जा सकती है जहाँ पर हमें पता चलता है कि स्टॉलिपिन ने यातना और दण्ड के हरेक विधान व तंत्र को अपना नाम दिया था। रुसी मिलिट्री ने ग्रामीण क्षेत्रों में खेतिहरों के उपद्रवों को शांत करने के लिए जल्लाद के फंदे को ‘स्टॉलिपिन नेकटाई’ से नवाज़ा था। ठीक उसी तरह, विद्रोहों को दबाने और विद्रोहियों पर हर संभव यातनाएँ (शारीरिक व मानसिक) ढाये जाने की नीयत से जब विद्रोहियों को साइबेरिया के बर्फीले रेगिस्तान में रेल के जिन मालवाहक डब्बों में उन्हें ठूस-ठूस कर भेजा जा रहा था उनका नाम भी “स्टॉलिपिन कैरिज” रखा गया था।

विद्रोह में भीड़ की जो प्रबल मानसिकता होती है उसकी जड़ पर चोट करने की मंशा से स्टॉलिपिन ने एक आतंक का साम्राज्य स्थापित करने की कोशिश की जिसमे वो काफी हद तक सफल भी रहा। आतंकी के मन में आतंक का घर करना बेहद नामुमकिन सा लगता है पर ठीक यही करने में सफल हुआ स्टॉलिपिन, अपने नाम का प्रयोग कर उसने विद्रोहियों के मन में यातनाओं के प्रति मानसिक-शारीरिक उत्पीड़न की घोरतम रूप-रेखा चित्रित की।

स्टॉलिपिन के यत्नो का लोगों के मन पर कुछ यूँ दहशत था कि 1917 के बाद ज़ारवादी शासन-व्यवस्था के प्रबल समर्थक-प्रशंसक भी स्टॉलिपिन की खुलेआम  निंदा करते हुए ये कहने लगे कि स्टॉलिपिन के कार्यों ने ज़ार के पक्ष में माहौल बनाने से से ज्यादा ऑटोक्रेसी के पवित्र सिंद्धातों की अवहेलना और उल्लंघन की। फलतः ज़ारवादी व्यवस्था लोगों में  विश्वास खोती गयी और लोग ज़ार से बिफरते गए।


खैर,  ये अलग बात है कि स्टॉलिपिन ही वो शख़्स था जिसने ज़ार के रूस में आशा की एक किरण दिखाई थी, बदलाव की बयार बहायी। लेकिन फिर यह भी गौर करने वाली बात है  कि रूस में ऑथोरिटेरियन स्टेट्समैनशिप के प्रशसंकों में स्टॉलिपिन की एक बेहद खास छवि है। उनके अनुसार स्टॉलिपिन ही एक ऐसा अकेला राजनेता था जिसमे वो सारी खूबियाँ व लीडरशिप स्किल था जो रूस को क्रांति और सिविल वॉर के चंगुल से बचा सकता था। स्टॉलिपिन के नेतृत्व परम्परा में ही व्लादिमीर पुतिन का नाम आता है, पुतिन भी उसी लीडरशिप क्वालिटी को मैच करता है जिसका प्रदर्शन स्टॉलिपिन ने ज़ार के दौर में किया था – वही सख़्ती, वही नो-नॉनसेंस इमेज के साथ प्रशासन को सँभालने की कला।

ऑथॉरिटारियन सत्तावादी का यह कहना है कि स्टॉलिपिन के रिफॉर्म्स को अगर थोड़ी और समय मिला होता तो ज़ाहिर तौर पर वो रूस को वेस्ट की तर्ज पर लिबरल पूंजीवादी समाज में बदल चुका होता। पर, समय ही वो इकलौती चीज़ थी जो स्टॉलिपिन के पास नहीं था। और फिर यह भी एक प्रश्न है कि क्या रुसी जनमानस में उबलते क्रन्तिकारी भाव को महज रिफॉर्म्स से शांत और संतुष्ट किया जा सकता था ? क्या पॉलिटिकल सुधार क्रांति को दस्तक देने से रोक सकते थे?

इतिहास के जानकार व राजनीति के पंडित बतलाते हैं कि स्टॉलिपिन रूस में गवर्नेंस की उसी परम्परा को रिप्रेजेंट करता था जो कि पीटर द ग्रेट से लेकर पुतिन तक चलता आ रहा है। हालांकि स्टॉलिपिन के रिफॉर्म्स का मुख्य उद्देश्य रूस में लोकतान्त्रिक व्यवस्था लाना नहीं था बल्कि लोकतान्त्रिक तत्वों के माध्यम से ज़ारवादी तंत्र को मजबूत सहारा उपलब्ध करवाना था। स्टॉलिपिन के साथ ड्यूमा के रिश्ते की बुनियाद सोच पर खड़ी हुई जिसके कायदे-कानून केवल इससे निर्धारित हुए कि ज़ारवादी तंत्र को किन-किन चीज़ों से फायदा मिल सकता है और किन-किन बातों से उनका नुकसान होगा। स्टॉलिपिन के लिए ड्यूमा की ज़रुरत महज एक ऍपेन्डेज की भांति थी। एक ऐसा पब्लिक फोरम जिसका काम केवल सरकारी कामों पर बिना किसी नाक-नुक्स के मोहर लगाना था। किसी भी स्वरूप में वो सरकार या ज़ार की शक्तियों पर अंकुश लगाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने की नहीं थी। स्टॉलिपिन का कोंस्टीटूशनल मॉडल ब्रिटिश के बजाय प्रशियाई ज्यादा था। होता भी क्यों न! आखिर बिस्मार्क स्टॉलिपिन का पोलिटिकल हीरो जो था।

फरवरी 1907 में दूसरी ड्यूमा का गठन हुआ था। स्टॉलिपिन ने इस ड्यूमा को केवल उसी हद तक बर्दाश्त किया जिस हद तक वो इसके मन मुताबिक़ काम करती थी। वैसे ये अलग बात है कि स्टॉलिपिन के प्रशासन ने ऐसे सारे यत्न किये थे जिससे कि ड्यूमा में उन लोगों की संख्या ज्यादा हो जो स्टॉलिपिन के हक़ में बोले या यूँ कहें तो स्टॉलिपिन की कही बात ही करें। और ऐसे में एक पार्टी थी जो ज़ारवादी तंत्र की क़रीबी मानी जाती थी। ऑक्टोबरिस्ट्स – ‘स्टेट आर्डर की पार्टी’ – अक्टूबर मैनिफेस्टो के राजनीतिक सिद्धांतों  में अपना विश्वास रखने वाली पार्टी जो स्टॉलिपिन की सहयोगी मानी जाती थी। हालांकि इस ड्यूमा में इनके केवल 54 सदस्य ही थे, और कैडेस्ट्स के 98 और सेंट्रिस्ट्स व राइटिस्टों के 60 सदस्यों को मिला कर भी वे सोशलिस्टों के सामने बौने प्रतीत होते थे, जो संख्या में 222 थे। यहाँ ये ध्यान रखना चाहिए कि सोशलिस्टों छोड़ अमूमन हर पार्टी स्टॉलिपिन को किसी न किसी रूप में संतुष्ट करती नज़र आती थी। और इसीलिए सोशलिस्टों का बड़ी संख्या में होना सरकार के लिए ड्यूमा में अपने प्रस्तावों को आसानी से पार पाना मुमकिन न था।

चूकि ड्यूमा में सोशलिस्टों के क्रन्तिकारी बदलावों की मांगों को देख-सुनकर रूस में लेफ्ट की सारी पार्टियों ने ड्यूमा का बहिष्कार करना बंद कर दिया था जिससे कि सोशल डेमोक्रेट्स समेत सभी लेफ्ट पार्टियाँ ड्यूमा में सरकार की घेराबंदी करने पर आमदा थी। अब स्टॉलिपिन खेतिहर सदस्यों पर भी अपना भरोसा नहीं रख सकता था। एक बार तो उसी  सराटोव प्रान्त से आने वाले एक कृषक सदस्य ने भूमि-सुधार पर हो रहे बहस के दौरान एक कुलीन सदस्य से यह कह दिया कि: “हम आपकी संपत्ति से पूरी तरह से वाक़िफ़ हैं, एक वक़्त पर हम आपके लिए आपकी सम्पत्ति हुआ करते थे। मेरे अंकल और एक ग्रेहाउंड की अदला-बदली हुई थी।”

अपने सुधारों के प्रति समर्थन की धूमिल होती आशा की स्थिति में स्टॉलिपिन को ड्यूमा को बर्ख़ास्त करने में कोई  गुरेज़ नहीं था। उसे निर्वाचन कानून में संशोधन करने में कोई संकोच नहीं हुआ। स्टॉलिपिन यह पूरी तरह से सुनिश्चित करना चाहता था कि अगली बार जब ड्यूमा निर्वाचित होकर गठित हो तो उसमे कन्ज़र्वेटिव तबके का बोलबाला हो। ठीक ऐसा हुआ भी। नवंबर 1907 में तीसरी ड्यूमा की पहली बैठक हुई तो प्रो-गवर्नमेंट पार्टियाँ बहुमत में थी। ऑक्टोबरिस्ट्स और राइटिस्ट्स ने 443 में से 287 सीटों पर अपना कब्ज़ा जमाया था। रेडिकल तत्वों के लिए तीसरी ड्यूमा महज एक मज़ाक था। तीसरी ड्यूमा को उन्होंने कुछ इस तरह परिभाषित किया: ‘Duma of Lords and Lackeys.’ (संभ्रांतों और अनुचरों की सभा/ड्यूमा)

इसमें कोई शक नहीं है कि 3 जून की डिक्री जिसके द्वारा दूसरी ड्यूमा को स्टॉलिपिन ने भंग किया था तकनीकी रूप से फंडामेंटल लॉज़ के ऊपर अतिक्रमण था। लिबरलों ने इसे ‘कूप’ की संज्ञा देने में देर नहीं लगायी। यहाँ तक कि ओक्टोबरिस्ट्स भी इससे खासे परेशान दिखे। तमाम बातों में एक बात साफ़ हो चली थी – अपने कठोर और मनमाने तौर-तरीकों की देन से स्टॉलिपिन ने अपनी पॉलिटिकल धुरी को क्षीण ही किया। जिसमे सबसे ज्यादा घाटा उसे लिबरलों को नाख़ुश करने से होने वाला था क्योंकि लिबरल ही वो ब्रिज था जो ज़ारवादी शासन और सोसाइटी के बीच की खाई को पाट सकता था।

स्टॉलिपिन ने संसदीय व लोकतान्त्रिक सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए हाई-हैंडेडनेस के साथ अपनी पॉलिसियों को लागू करवाने के पीछे की अपनी मंशा ज़ाहिर करते  उन्होंने ब्रिटिश एम्बेसडर से ये कहा था कि रूस को पश्चिम की भांति गवर्न नहीं किया जा सकता है। राजनीतिक जीवन व संसदीय आदर्श रुसी जनमानस के लिए एक अबूझ पहेली हैं।

स्टॉलिपिन की नज़रों में लैंड रिफॉर्म्स उसी डेफिसिट को पाटने की कवायद थी। भूमि-सुधारों के पीछे का अर्थशास्त्र रूस में एक नए वर्ग की रचना करने का था। इसके तहत वह खेतिहरों को भूमि-मालिकों के रूप तब्दील करना चाहता था। स्टॉलिपिन का यह विश्वास था कि खेतिहर मज़दूर जब अपने खेतों के मालिक होंगे तो ऐसे में वो व्यवस्था में अपनी भागीदारी समझेंगे और फिर वे स्थानीय जेम्सटोव पॉलिटिक्स  सरकार के हिमायती के तौर भाग लेंगे। स्टॉलिपिन के शब्दों में यह ‘wager on the strong’ था।

स्टॉलिपिन के भूमि-सुधारों के मुताबिक विलेज कम्यून को ख़त्म किया जाना था। वही विलेज कम्यून जो क्रांति के दिनों में खेतिहरों को एकजुट करने में अहम भूमिका अदा की थी, बड़े किसानों को इस बात के लिए राजी किया जाना था कि वे इन्हे छोड़कर खुद के फार्म गठित करें। 9 नवंबर 1906 के एक कानून के द्वारा खेतिहर परिवार के मुखिया को ये अधिकार दिया गया कि वे अपनी कम्युनल पट्टे के कृषि-योग्य ज़मीनो को प्राइवेट प्रॉपर्टी के तहत इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र होगा। अगर वह गाँव के अंदर ही एनक्लोसिंग के लिए राजी होता है तो उसको कानूनी रूप से ‘khutora’ कहा जायेगा और यदि वह गाँव के बाहर कंसोलिडेटेड होल्डिंग के लिए राजी होता है तो उसे ‘otruba’ कहा जायेगा।

इन सबके बाद सेपरेशन की प्रक्रिया को तमाम अग्रोनॉमिक उपायों से तेजी निपटाने के लिए अधिनियम लाये गए। साथ-ही-साथ, Peasant Land Bank से कम ब्याज दरों पर ऋण भी उपलब्ध करवाए  गए जिससे कि खेतिहरों को नए ज़मीनों को खरीदने में परेशानी न उठानी पड़ें। ज़ारवादी रुसी राज्य ने इन सुधारों को लागू करने के पीछे अपनी पूरी जान लगा दी। रमेनोव रुसी इतिहास में ये पहली दफा हो रहा था जब एक बड़े बदलाव को धरताल पर उतारने के लिए पहली बार इतना गंभीर प्रयास किया जा रहा था। यह तब और महत्वपूर्ण प्रतीत होता है जबकि इसमें खेतिहरों की आम ज़िन्दगी में सकारात्मक बदलाव के लिए प्रयास किये जा रहे थे।

शायद जबतक यह सफल नहीं हो जाता था तबतक यह भी आख़िरी साबित होने को था। चार मंत्रालयों, सैकड़ों प्रांतीय व जिला लैंड कमीशनो और हज़ारों की संख्या में अधिकारीयों, सांख्यिकीविदों व अग्रोनॉमिस्टों की सरकारी मशीनरी को इस इनक्लोज़र मूवमेंट को सफल के पीछे झोंक दिया गया। इस अभियान की जल्द-से-जल्द पूरा करने के पीछे शासन-तंत्र की वो समझ थी जिसमे उसे ये इल्हाम हो चला था कि ज़ार तंत्र का बेहद अस्तित्व नए सिरे से प्राइवेट प्रॉपर्टी पर आधारित नवीन कृषकीय व्यवस्था की स्थापना होने पर निर्भर करता है।

लेकिन आम खेतिहरों की ख़्वाहिश कुछ और ही थी, ज़ाहिर तौर पर उन्होंने कम्यून के तोड़े जाने का मुखर स्वरों में विरोध करना शुरू कर दिया। खेतिहरों के पास बहुत गहरे सांस्कृतिक कारण थे जिनकी वज़ह से वो कम्यून के तोड़े जाने का विरोध करने को विवश थे। कम्यून सदियों से खेतिहरों के जीवन का केंद्रबिंदु थे। और ऐसा भी नहीं था कि कम्यून के हटाए जाने से समस्यायों का निदान हो जाता, किसानो की समझ में तो ऐसा ही था। खेतिहरों की चिंता का सबसे मूल कारण यह था कि कम्यून के एक हिस्से की ज़मीन कुछ खेतिहरों के मालिकाने हक़  में दिए जाने से बाकी के खेतिहरों का परम्परागत अधिकार जिसके तहत वो कम्यूनल भूमि से अपने गुज़ारें का खाद्यान या अन्य जरुरत के सामान इकठ्ठा किया करते थे वो ख़त्म हो जाने थे।

खेतिहरों की चिंताएँ जायज़ भी थी। क्या होगा जब कोई खेतिहर-भूमि मालिक अपनी सम्पत्ति अपने बड़े लड़के को सौप दें या फिर तमाम ज़मीन को सम्पूर्णतया बेच ही दें? तब तो बाकी के परिवारजन एक झटके में ही कंगाल नहीं हो जायेंगे? या फिर तब क्या होगा जब कोई अमीर किसान पूरी-की-पूरी ज़मीन ही खरीद ले ? परिवार के परिवार बिना किसी अलम के कैसे खुद से स्वयं का वहन कर सकते हैं ? फिर आम खेतिहरों को एक और डर सता रहा था था जो शायद और भी ज्यादा बेचैनी का सबब बना हुआ था – चूकि सरकारी सर्वेयरों को साफ़ तौर पर इंस्ट्रक्शन दिए गए थे कि वे खेतिहरों को कम्यून से निकल कर सम्पत्तियों के इन्क्लोजर के लिए ‘प्रोत्साहित’ करें, अतः आम खेतिहरों में एक गहरा डर समाया हुआ था कि सरकारी सर्वेयर उन खेतिहरों को उच्च कोटि की खेतिहर ज़मीन में उनके हक़ से अधिक का हिस्सा देंगे। यह डर ज्यादा संरचनात्मक था। खेतिहर मज़दूर जो पुश्तों से कम्युनल सम्पत्ति पर अपने जीवन निर्वाह के लिए डिपेंडेंट थे एक झटके में उनसे अच्छी ज़मीनों को छीन लिया जायेगा।

वास्तव में खेतिहरों का डर अपनी जगह पर उचित था। कैसे कोई ये स्वीकार कर ले कि ज़मानो से चली आ रही व्यवस्था एक झटके में  ही ख़त्म कर दी जाएगी। सदियों से जो व्यवस्था चली आ रही थी, कम्यून और खेतिहरों के बीच का गुँथा हुआ ताना-बाना इतना गूढ़ था एक झटके में उसके सियन खोल दी जाएगी, गिरह काट दिए जायेंगे। नहीं ऐसा तो सोचना भी मन में असुरक्षा के गहरे भाव पैदा करता है। संवेदना का ज्वार उफान मारने लगता है। जैसे कोई निर्दयिता से बदन पर आरी चला जायेगा जुबाँ सिले होंगे और सिवाए छटपटाने कोई दर्द से कराह भी नहीं पायेगा। मन की पीड़ा तन की व्याधा शून्य में ही विलीन हो जायेगा। दर्द की दवा करने को कोई भी मौजूद होगा। शायद दर्द की दास्तां से उबरने का सबसे आसान सा रास्ता यह था कि वो सरकार के सामने घुटने न  टेकते हुए डटकर धरातलीय सच्चाई से उखड़े बदलाओं के प्रति अपना विरोध ज़ाहिर करें।

इन तमाम सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक बातों के मध्य कुछ मुद्दे तकनीकी तौर पर भी परेशान करने वाली थी। उनका कहना था कि कैसे यह सुनिश्चित हो सकेगी कि एक जगह पर अच्छी खेतिहर ज़मीन के बदले में और सभी खेतिहरों में बराबरी बरतने के लिए दूसरी जगह पर पर कम उत्पादक भूमि आवंटित की जा रही है ? फिर खेतिहरों के मन में सैकड़ों सवाल थे – सवाल जो बेहद मूलभूत थे मसलन कम्यून में अबतक साँझे में आने वाली तथाकथित सम्पत्ति मानी जा रही चीज़ों का बँटवारा कैसे होगा – जंगल के पेड़-पौधों का बँटवारा, नदी-नालों का बँटवारा, खुले चारगाह-मैदानों – कोई कैसे करेगा इनका बँटवारा, इन सबका बँटवारा किस दर्जा होगा! और बात जब जब नए इन्क्लोजरों में नए सिरे से राहों को बनाने की होगी तो क्या वो पुराने रास्तों या अभी तक जो कम्यून की साँझा सड़क हुआ करती हैं उनको काटते हुए नहीं निकालेंगे।

आम खेतिहरों की समस्या तकनीकी होने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक भी थी। उनके लिए यह स्वीकार करना गैर-मुमकिन था कि शहर से सूट-बूट में आये सरकारी सर्वेयर और एग्रोनॉमिस्ट अपने गणितीय तामझाम के साथ ज़मीनो की हद उनकी लम्बाई और चौड़ाई से निश्चित कर रहे है। आम खेतिहर पुश्तों से अपने  ज़मीनों की हदों को ‘नज़र के फ़र्क़’ से पहचानते थे। उनके लिए ज़मीन की पहचान उनके ज़मीन की मिट्टी की उर्वरता, उसकी उतार-चढ़ाव से होता था। ज़ाहिर तौर पर ट्राइपॉड, रूलर और फीतों से ज़मीनों की हदें तय करना उनके लिए अनजाना था, विश्वास से परे था। वो शायद इसीलिए भी की सरकार खेतिहरों को विश्वास नहीं दिला पायी और चुकि पहले से ही क्रांति के दिनों से उनके और सरकार के बीच तनातनी का रिश्ता था जो किसी भी लिहाज से एक-दूसरे में विश्वास पैदा करने की एवज़ से नाकाफी था।

ठीक इन्ही सभी कारणों की मौजूदगी और सरकार की एकतरफा हड़बड़ी आम खेतिहरों को उनकी ज़िन्दगी का सबसे क्रूर डर का एहसास कराने को काफी था। और फिर क्या था डर की मौजूदगी काफी होती है डर की मौजूदगी के कारण को समाप्त करने की या उससे पार पाने की। कम्यूनों ने सेपरेशन और सेपरेशन करने को राजी हुए किसानो का विरोध करना शुरू कर दिया। सरकार ने हालांकि सख्ती दिखाते हुए बल प्रयोग का सहारा लिया। हिंसा का रास्ता अख्तियार करते हुए सरकार ने अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी थी कि कुछ भी हो लेकिन यह लैंड रिफ़ॉर्म अभियान हर सूरत में कार्यान्वित होकर रहेगा।

लैंड कंसोलिडेशन की ख़ातिर 1915 से पहले तक सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक़ कुल 6 मिलियन अर्ज़ियाँ आयी थी। जिनमे से कुल एक तिहाई अर्ज़ियाँ पहले ही कंसोलिडेशन ना कराने की सूरत में पहले ही वापिस ले लिए गए। और फिर बाकी के एक मिलियन आवेदनों पर कंसोलिडेशन पूरे भी किये गए तो भी धमकियों और हिंसा के बलबूते पर ही मुमकिन हुए थे।

बहरहाल जो कुछ भी हुआ उन सभी घटनाओं के मद्देनज़र यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि लैंड रिफॉर्म्स अभियान  मानकों से एक घोर असफल अभियान था। 1906 और क्रांति की पूर्व-वेला पर कुल 15 प्रतिशत खेतिहर घराने ही कंसोलिडेटेड लैंड्स की मार्फत ज़मीनों को प्राइवेट प्लॉट्स के तहत रजिस्टर हो पाए थे। इस नए जुड़े खेतिहर वर्गों के बाद यूरोपियन रूस में वंशानुगत किस्म की लैंड होल्डिंग कुल लैंड होल्डिंग की 30% ही थी। इन सब के बाद यह भी उल्लिखित करना आवश्यक है कि हरेक खेतिहर घर जिसने सफलतापूर्वक लैंड कंसोलिडेशन की प्रक्रिया पूरी करवाई और इन्क्लोजर का मालिक बना ठीक उतनी ही संख्या में वैसे  भी खेतिहर घराने थे जिन्होंने कंसोलिडेशन की अर्ज़ी दी और इन्क्लोजर करवाना चाहा था। मगर यह मुमकिन नहीं हो पाया और इसका सीधा-सा कारण कम्यून के विरोध के होने के साथ-साथ ब्यूरोक्रेटिक हीला-हवाली भी था। और जिसका स्पिन-ऑफ इफ़ेक्ट ये हुआ कि इस हौसलापस्त सूरत-ए-हाल को देखते हुए बाकी के और खेतिहर जो इन्क्लोजर में थोड़ी भी दिलचस्पी भी रखते थे वे अपना झुकाव खो बैठे।

उस वक़्त की परिस्थितियों से परे, इतिहास का ताप महसूस करते हुए आज ये कहने में कोई हिचक नहीं महसूस होती कि शायद भूमि सुधार अभियान सफल होने की लिहाज से कुछ ज्यादा ही महत्वाकांक्षा लिए हुए था और सफल होने से ज्यादा इसके ऊपर सरकार को अपने अस्तित्व की तलाश का बोझ था जोकि  नतीज़तन फेल होने की तरफ बढ़ता चला गया। सत. पीटर्सबर्ग के शाही महलों में बैठे नौकरशाहों के लिए शायद यह बेहद आसान था कि वे विदेशी पूंजीवादी तौर-तरीकों को रुसी आम खेतिहर जनता पर थोप दे। पर मामला इतना सीधा-सपाट नहीं था।

ज़ार का रूस में खेतिहरों के जीवन की पूरी धुरी विलेज कम्यून के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। विलेज कम्यून एक पुरातन संस्था थी, कई मायनों में एक जीर्ण-शीर्ष व बेहद अनुपयोगी संस्था मगर फिर भी खेतिहरों की बेसिक ज़रूरतों को पूरा करने में पूरी तरह से सक्षम। भले ही आम खेतिहर गरीबी के हाशिए पर गुज़र-बसर कर रहे होते हैं, किसी भी प्रकार का रिस्क लेने से डरते थे, बाहरी लोगों के प्रति सशंकित रहते थे और ज्यादातर प्रतिकूल व्यवहार दर्शाते थे, अनफ्रेंडली होते थे।

जबकि वही स्टॉलिपिन समेत पीटर्सबर्ग शहर के रुसी नौकरशाहों का यह मानना था कि रूस के आम खेतिहर केवल इसीलिए ग़रीब हैं क्योंकि वे कम्यून में रहते हैं। और उनके मुताबिक कम्यून तोड़कर वो उनकी जीवन-शैली बदल देने के साथ-साथ उनके जीवन में समृद्धता और खुशहाली भी ला सकेंगे। पर हक़ीक़त ठीक इसके विपरीत थी। कम्यून इसीलिए इक्जिस्ट करता था क्योंकि किसान ग़रीब थे। कम्यून ही वो माध्यम था जिसके तहत ये भूमिहीन किसान एक दूसरे की ग़रीबी को साथ-साथ जीते थे, कम्यून प्रत्येक किसान की ग़रीबी को सामूहिक ग़रीबी के रूप में तब्दील कर देता था। और यही एक कारण था जिसकी वज़ह से वो कम्यून के तोड़े जाने का विरोध कर रहे थे। आखिर वो कम्यून ही तो था जो उनको सहारा देता था  और सरकार बिना ग़रीबी हटाए उन्हें उनके जड़ से उखाड़ना चाहती थी। यह भला कहाँ संभव था !

बूरा हो या भला हो, इस बात में कोई संशय नहीं है कि कम्यून की तमाम समतामूलक परम्पराएँ आम किसानों के मन में एक आदर्श सामाजिक न्याय का अनगढ़ तस्वीर खींच चुकी थीं। किसानों के मन की मान्यताएँ भले ही छोटी हों या अमूर्त्त हों पर कम्यून से प्रभावित होकर ही उन्होंने 1917 में अपनी क्रांति के नारे तय किये थे।

बात अगर स्टॉलिपिन के सुधार प्रयासों की करें तो ज़ारवादी तंत्र के अंदर ही दो खेमें का शिकार हो चूका था। ज़ार स्टॉलिपिन  पर भरोसा तो रखता था पर कोर्ट की पॉलिटिक्स और कुलीनों और ज़ार की व्यक्तिगत आकांक्षाएँ स्टॉलिपिन के प्रयासों के आड़े आने लगे थे। ज़ार स्पष्ट रूप से ऐसी कोई भी व्यवस्था को पसंद नहीं करने वाला था जो उसके ऑटोक्रेसी के मानकों पर खड़ा न उतरता हो। और स्टॉलिपिन के प्रयास जहाँ तक रूस की राजनीतिक व्यवस्था को  जिस दिशा की ओर ले जा रहे थे वो सीधे-सीधे ज़ार के असीमित अधिकारों पर बेड़ियाँ लगाने का काम करते। स्टॉलिपिन के सुधार-प्रयासों के तेवर से यह जग ज़ाहिर हो चूका था कि वह पश्चिमी दुनिया की तर्ज पर रूस को भी एक उदारवादी राजव्यवस्था के रूप में बदल देने की ठान चूका है।

लेकिन तभी राजनीतिक जरूरतें करवट ले चुकी थी। जबतक कुलीनों और ज़ार को खेतिहरों के फिर से हिंसक क्रांति का रास्ता अख्तियार करने का डर सताता रहा तब तक वो स्टॉलिपिन के सुधारों में उसके साथ खड़े नज़र आये और ठीक जैसे ही क्रांति की यादें भूली-बिसरी बात होने लगी कुलीन वर्ग और ज़ार स्टॉलिपिन की कार्यशैली से नाखुश होने लगे जिसका सीधा इशारा स्टॉलिपिन के सुधार-प्रयासों के विरोध से था। कुलीनतंत्र का यह मानना था कि स्टॉलिपिन की अगर यूँही चलती रही तो रूस से ऑटोक्रेसी का नामों-निशान मिट जायेगा और ज़ार पद्चुय्त हो जायेंगे।

स्टॉलिपिन के राजनीतिक सुधारों ने हलचल मचा दी थी। ज़ार के साथ-साथ ज़ारतंत्र के समर्थकों को लगने लगा कि स्टॉलिपिन जो कुछ भी कर रहा है उसके नतीज़ों में रूस में बैलेंस ऑफ़ पावर का डायनामिक्स बदल जायेगा। सत्ता की बागडोर जो अबतक कोर्ट संभाले हुए है वो अब इम्पीरियल स्टेट की इंस्टीटूशनल हायरार्की के धुँधलके में कही खो जायेगा। और इसने कोर्ट और कौर्टियरो दोनों में बेचैनी का कारण बन चुका था। ‘कोर्ट’ से आगे बढ़कर ‘स्टेट’ की रचना करना ज़ार को अपने पॉवर का एक्सटेंशन लगा। वही स्टॉलिपिन की नज़रों में रिफॉर्म्स अब्सट्रैक्ट तरीके से रिफॉर्म्स की पहल थे – वंशवाद और अरिस्टोक्रेसी से परे एक समतामूलक समाज की स्थापना की तरफ पहला कदम। लेकिन वही ज़ार निकोलस द्वितीय किसी भी लिहाज़ से इसके लिए तैयार नहीं था वो एक असफल क्रांति के बाद भी उसी मॉस्कोवी पैट्रिमोनिअल विचारधारा में जी रहा था जिसके तहत समस्त रूसियों का पिता ज़ार  होगा और वो अरिस्टोक्रेसी की हर हाल में रक्षा करेगा। ये अलग बात है कि स्टॉलिपिन सुधारों को लागू करके भविष्य में ज़ारवादी शासन-व्यवस्था के प्रति होने वाले संभावित खतरों को पहले ही समाप्त करने की पहल कर रहा था।

ज़ार और कन्जर्वेटिवों की ज़मात के लिए स्टॉलिपिन का कद्दावर व मज़बूत राजनीतिक कद – प्रशासन में अंदर तक पहुँच और रुसी जनमानस ऊपर स्टॉलिपिन का ज़बर्दस्त प्रभाव – ये सब कुछ उनके लिए मानसिक रूप कष्टदायक था, भयावह था। एक प्रधानमंत्री होने के नाते स्टॉलिपिन ने निकोलस से ज्यादा शक्तिशाली प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। स्टॉलिपिन ने एक बृहत व कॉम्प्लेक्स स्टेट की परिकल्पना कर ज़ार के प्रशासनिक-तार्किक सोच को चुनौती दी थी। स्टॉलिपिन जिस तरह के मॉडर्न स्टेट की कॉम्प्लेक्स आधारशिला रखने वाला था वो किसी भी स्वरूप में ज़ार के वैचारिक हद से बाहर था। स्टॉलिपिन का ब्यूरोक्रेटिक स्टेट ज़ार के पर्सनल रूल को ओवरशैडो कर देने वाला था। ज़ार के लिए ब्यूरोक्रेसी आधारित इम्पीरियल स्टेट जिसके ऊपर कोर्ट की व्यवस्था एक गहन रहस्य था। और इन सभी गलतफहमियों से या यूँ कहें तो ज़ार का खुद का डर उसपर हावी था जो सीधे तौर पर स्टॉलिपिन की कद्दावर छवि से उपजी असुरक्षा की भावना से उत्पन्न हुआ था।

कोर्ट की तरफ से स्टॉलिपिन को पहला विरोध Naval General Staff Bill, 1909 के ड्यूमा में पेश होने के वक़्त मिला। इस बिल के ऊपर ड्यूमा की इम्पीरियल डिफेंस समिति को वीटो हासिल था और इसी अधिकार का प्रयोग करते हुए समिति ने ये फरमान जारी किया कि अगर naval general staff कोर्ट के बजाय मिनिस्ट्री ऑफ़ वॉर के क्षेत्राधिकार में जबतक नहीं आते तब तक ये बिल के पास होने के कोई आसार नहीं होंगे। ड्यूमा का Naval General Staff को खुलेआम अल्टीमेटम निकोलस के लिए अभूतपूर्व था। निकोलस ने इसे अपनी संप्रभुता पर सवालिया निशान लगाता हुआ माना। मिलिट्री कमाण्ड को क्राउन से छीनता देख उसने अपने प्रीरोगेटिव का प्रयोग करते हुए बिल पर वीटो लगा दिया।

निकोलस इस बात से बेहद नाराज़ था कि स्टॉलिपिन और उसके मंत्रिपरिषद ने इस बिल को सपोर्ट किया था। ये घटना काफी थी स्टॉलिपिन के खिलाफ ऑटोक्रेसी के समर्थकों को ज़ार के पीछे लामबंद होने को और उसे स्टॉलिपिन को दण्डित करने के लिए उकसाने लगे। हालांकि ये अलग बात है कि ज़ार स्टॉलिपिन की कीमत को पहचानता था और इससे पूरी तरह से वाक़िफ़ था कि अगर उसे अगर पदच्युत भी किया तो रुसी जनता में जो उसने साख बनाई है उसका कोपभाजन सहना पड़ेगा।

लेकिन स्टॉलिपिन को बर्ख़ास्त नहीं भी करके ज़ार और अरिस्टोक्रेसी के हिमायतियों ने स्टॉलिपिन के किये गए सारे सुधारात्मक प्रयासों को वास्तव में एक सिरे से खारिज कर दिया। स्टॉलिपिन के शिक्षा सुधार जिसमे वो शिक्षा व्यवस्था को खासकर प्राइमरी एजुकेशन को चर्च के अधिकार क्षेत्र से छुड़ा कर स्टेट की निगरानी में करवाने की व्यवस्था कर रहा था उन्हें चर्च में मौजूद प्रतिक्रियावादी तत्वों ने समाप्त करवा दिया। ठीक यही हश्र हुआ उसके उन लेजिस्लेटिव प्रयासों का भी जिसके माध्यम से उसने यहूदियों के प्रति होने वाले भेद-भावों को कम करने के प्रयास किये थे।

सुधारों को सबसे बड़ी पटखनी तब मिली जब स्टॉलिपिन के लोकल गवर्नमेंट रिफॉर्म्स को जेन्ट्री और नोबिलिटी से जबर्दस्त प्रतिरोध के मद्देनज़र ज़ार द्वारा निरस्त कर दिया गया। स्टॉलिपिन ने अपने इन सुधारों के ज़रिये रूरल पॉलिटिक्स में संभ्रांत-वर्ग के गैर-चुनौतीपूर्ण वर्चस्व के ढाँचे पर चोट करने की व्यवस्था की थी। स्टॉलिपिन का मानना था कि जबतक किसानों को पॉलिटी में इंगेज नहीं किया जायेगा तब तक किस दर्जा उम्मीद की जाये कि वो शासन-प्रशासन के प्रति गंभीर होंगे। ‘सेंस ऑफ़ बिलोंगिंग’ की साइकॉलॉजी को समझते हुए स्टॉलिपिन का यह इरादा था कि खेतिहरों को जमीन देकर उन्हें जेम्सटोव पॉलिटिक्स में नोबिलिटी के सापेक्ष बराबरी का दिलाया जाये। स्टॉलिपिन ने नए सुधारों के जरिये पीसेंट-क्लास कोर्ट्स को भी समाप्त करने का प्रावधान किया। स्टॉलिपिन ने यह तय किया था कि खेतिहरों को भी सामान रूप से सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार में ले आया जाए ताकि उन्हें बराबरी का एहसास हो। स्टॉलिपिन की यह सोच बिलकुल जायज़ भी थी और सभी मायनों में समयानुकूल भी।

जबतक खेतिहर व्यवस्था से जुड़ेंगे नहीं, व्यवस्था के साथ अपनी अस्तित्व और अपनी पहचान को जोड़कर न देखेंगे तो फिर वो कैसे व्यवस्था के साथ लगाव पैदा कर सकेंगे। इन्हीं सोच-विचारों के साथ स्टॉलिपिन ने स्थानीय राजनीतिक संस्था जेम्सटोव में राजनीतिक सुधारों की वकालत की। हालिया व्यवस्था के अंतर्गत खेतिहरों को और वर्गों के बराबर ही सामान राजनीतिक व विधिक अधिकार प्रदान कर यह साँझे अस्तित्व की पहचान का बीज उनके मन में बोया जा सकता था।

“First of all, we have to create a citizen, a small landowner, and then the peasant problem will be solved.”

          • Stolypin.

स्टॉलिपिन ने प्रोपोज़ किया कि जेम्सटोव में ज़िले (volost) के स्तर पर एक नए प्रतिनिधित्व स्तर की रचना की जाये जहाँ खेतिहरों को भी वही अधिकार होंगे जो नोबिलिटी को  हासिल हैं। नोबिलिटी और खेतिहर पहली बार एक दूसरे की बराबरी कर रहे होते। पर जेन्ट्री को कहाँ ही यह मंजूर था, उन्होंने स्टॉलिपिन का घोर विरोध करना प्रारम्भ कर दिया यह कहते हुए कि स्टॉलिपिन लोकल रूरल पॉलिटिक्स में हमें नज़रअंदाज़ कर खेतिहरों को सर्वेसर्वा बनाना चाहते हैं। और फिर तमाम जेन्ट्री-वर्ग ड्यूमा और स्टेट कौंसिल में एकजुट होकर स्टॉलिपिन के रिफ़ॉर्म लेजिस्लेशन का खूब विरोध करते हैं। फलतः स्टॉलिपिन हार मान लेता है और लोकल पॉलिटिक्स में खेतिहरों को इंगेज कर उन्हें मुख्यधारा  में लाने की कोशिश भी धरी-की-धरी रह जाती हैं।

नौसेना बिल मामले और उसके बाद जेन्ट्री का लोकल पॉलिटकल रिफॉर्म्स के बवाल के बाद स्टॉलिपिन ड्यूमा में सपोर्ट खो बैठता है। ओक्टोबरिस्ट्स नेपथ्य में चले जाते हैं। अब स्टॉलिपिन के पास सिर्फ नेशनलिस्ट्स ही रह जाते हैं जिनका थोड़ा बहुत दारोमदार अभी भी बचा हुआ होता है। नेशनलिस्ट्स का फॉर्मेशन 1909 में रूस पश्चिमी सीमांत प्रांतों में रुसी महत्व की बातों की हिमायत करने के लिए किया गया होता है। ये बात ध्यान देने योग्य है कि पश्चिमी सीमांत प्रांतों में रूस के अन्य प्रांतों जेम्सटोव स्थापना नहीं हुई थी क्योंकि यहाँ ज्यादातर जेन्ट्री पोलिश एथनिसिटी के थे, रूस के स्लाव से विपरीत।

स्टॉलिपिन के एक्टिव सपोर्ट की आधारशीला पर नेशनलिस्ट्स वेस्टर्न जेम्सटोव बिल के पक्ष में अनुसमर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे थे। वो ऐसे एक निर्वाचन प्रक्रिया की वकालत कर रहे थे जिसके तहत नोबिलिटी के साथ-साथ खेतिहरों के भी मत को भी सापेक्षतः सामान महत्व मिले। पर इस बिल का भी खूब विरोध हुआ। तमाम जेन्ट्री वर्ग एक सुर में इन बदलावों का जबर्दस्त विरोध करने लगा। आख़िरकार बिल को पास न होते देख स्टॉलिपिन ने इस्तीफ़ा देने की धमकी दी। मामले की गंभीरता का अंदाजा लगाते हुए ज़ार निकोलस द्वितीय ने ड्यूमा का सत्रावसान कर दिया और अनुच्छेद 87 में प्राप्त आपातकालीन अधिकारों का प्रयोग करते हुए बिल को पास कर दिया। हालांकि स्टॉलिपिन के प्रयास आख़िरकार रंग लाए पर निकोलस किसी भी स्वरूप में स्टॉलिपिन से खुश नहीं था। पर फिर वह स्टॉलिपिन को खोने की कीमत जानता था।

स्टॉलिपिन का प्रभावशाली व दमदार व्यक्तित्व ही था जो ज़ार और तमाम रुसी साम्राज्य को अपने मन मुताबिक़ कार्य करवाने पर मजबूर कर रहा था, अन्यथा उसका तल्ख़ रवैया और सख़्ती से अपनी बात लागू करवाने की प्रवृत्ति लगभग हर किसी को उससे दूर कर दिया था। लिबरल खेमा ड्यूमा के साथ उसके बर्ताव के कारण उससे शुरू से ही ख़फा रहा, ओक्टोबरिस्ट्स आधे-दूर आधे-पास वाली स्तिथि में रहें, ले देकर केवल नेशनलिस्ट्स ही केवल एक पार्टी थी जो स्टॉलिपिन को पूर्ण समर्थन देती थी।

पर इन सब के बाद एक और चीज़ भी होना बाकी था। स्टॉलिपिन की दिन-दहाड़े हत्या। डी.जी .बोरगॉव नाम के एक छात्र-क्रन्तिकारी, जो कि एक पुलिस इनफॉर्मर भी था, ने स्टॉलिपिन की हत्या तब की जब वो कीव ओपेरा हाउस में किसी कार्यक्रम का लुत्फ़ उठा रहा था। 1 सितम्बर 1911 के दिन ज़ार के रूस में ज़ारवादी साम्राज्य के ध्वस्त होने की कहानी शुरू हुई, इसी दिन जब स्टॉलिपिन को गोली का शिकार बनाया गया।

स्टॉलिपिन की हत्या की खबर सुनकर ज़ार ने सहसा ही कह डाला: “अब रूस में रिफ़ॉर्म की कोई बात नहीं होगी।”

स्टॉलिपिन की हत्या की खबर सुनकर ज़ार ने सहसा ही कह डाला: “अब रूस में रिफ़ॉर्म की कोई बात नहीं होगी।”

पर यह भी एक तथ्यात्मक सच्चाई है कि भले ही बोगरोव की गोली ने स्टॉलिपिन की शारीरिक हत्या की पर इस वाक़ये से काफी वक़्त पहले ही स्टॉलिपिन की राजनीतिक मृत्यु हो चुकी थी। स्टॉलिपिन के मरने के बाद सुधारों की सारी आशाएँ धूमिल हो गयी। वास्तव में ज़ारवादी रुसी साम्राज्य की प्रवृत्ति ही कुछ इस प्रकार की थी कि इसमें रत्ती भर भी सुधार की गुंजाइश नहीं थी। इसकी राजनीतिक सोच और ज़ारवादी अरिस्टोक्रेटिक व्यवस्था इसके खुद में पॉलिटिकल रिफ़ॉर्म न लाने की गारंटी थे। वेस्टर्न राजनीतिक संसदीय सिस्टम पर आधारित स्टॉलिपिन का संसदीय ऑटोक्रेटिक नज़रिया ज़ार को कभी भी पसंद नहीं आया। फिर लैंडेड अरिस्टोक्रेसी और चर्च के निहित स्वार्थ सभी का गणित स्टॉलिपिन के सुधारवादी गणित से बिलकुल उलट था।

हालांकि यह प्रश्न पूछना भी तर्क-संगत है कि क्या 1905 की क्रांति के जो मुख्य  कारण थे जैसे कि भूमि-सुधारों की बात, फैक्ट्री मज़दूरों के हक़ की बातें, क्या ये बातें ड्यूमा के मॉडरेट सुधार प्रयासों से किसी भी प्रकार से हल होने की हालत में थे क्या ? इनका जबाब साफ़ शब्दों में आपको “नही” ही मिलेगा। खेतिहरों की समस्या तभी हल होने वाली थी जब जेन्ट्री से ज़मीनों को कॉनफिस्केट कर लिया जाता और जहाँ तक बात मिल मज़दूरों की थी तो उनके लिए संरचनात्मक तौर पर एक्सप्लोइटेशन-फ्री माहौल सुनिश्चित करवाना ही अत्यावश्यक काम था। और ये बातें रूस के तात्कालिक राजनीतिक नेतृत्व में कतई भी संभव नहीं होने वाला था।

1907-1911 के संक्षिप्त कालक्रम में फैक्ट्रियों और खेतों में पूर्व की तुलना में शांति-व्यवस्था बनी हुई थी, पर अब फिर से दंगे-फसाद होने लगे और हिंसा का स्तर काफी बढ़ गया। 1914 – प्रथम विश्व युद्ध की पूर्व-संध्या – रूस एक बार फिर क्रांति की दहलीज पर खड़ा था, शायद इस बार 1905 से ज्यादा हिंसक, ज्यादा असरदार, ज्यादा आवृत्ति वाली क्रांति ज़ारवादी रूस का दरवाज़ा खटखटाने को थी। पर तभी प्रथम विश्व युद्ध आ धमका और प्रथम विश्वयुद्ध से भी पहले प्रशियाई नेतृत्व की बाल्कन में ऑस्ट्रियाई हितों को सह देना और वही रुसी साम्राज्य में बाल्कन क्षेत्र में स्लाव नृजातीय हितों की  रक्षा करने के प्रति जनता का ज़ार के ऊपर दबाव आया। और इस दबाव ने एक सी राजनीतिक सोच-समझ रखने वाले और पुरानी यूरोपियन मानसिकता का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रशियाई साम्राज्य और ज़ारवादी साम्राज्य को जंग में एक दूसरे के आमने-सामने आना पड़ेगा। नतीज़तन ज़ार को अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए यह एक मौका लगा और ठीक ऐसा हुआ भी बोल्शेविक समेत सभी पार्टियाँ ‘राष्ट्र की सेवा’ में एकजुट हो गयीं।

जर्मनी के लिए ऑस्ट्रियाई हितों को बढ़ावा देना उसकी स्ट्रैटेजिक ज़रुरत थी वही रूस के लिए बाल्कन भावनात्मक व धार्मिक महत्व रखता था। कस्तुतुनिया (Constantinopol) मध्य युग के बाइज़ेंटाइन साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी,  जिसे अक्सर ईस्टर्न रोमन साम्राज्य के नाम से पुकारा जाता है। रूस के शासकों की मनोदशा उन्हें बार-बार अपने खोये हुए साम्राज्य को वापस पाने की तस्दीक करते थे। और राजधानी होने के नाते कस्तुनतूनिया से उनका लगाव ज्यादा गहरा था, अगर सम्पूर्ण बाल्कन नहीं तो केवल कस्तुनतूनिया के जीत का सिम्बोलिज्म ज्यादा तसल्ली देने  वाला था। वेस्टर्न रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात क़रीब हज़ार और अधिक सालों तक वेस्टर्न रोमन साम्राज्य चलता रहा। ये आख़िरकार 1453 का ऑटोमोन तुर्कों का हमला होता है जो अंतिम रूप से इस विशाल व ऐतिहासिक साम्राज्य पतन होता है। रूस का ज़ार उस वक़्त के कस्तुनतूनिया को वापस पाना चाहता था। और यही कारण था कि रूस के वैदेशिक नीति में रणनीतिक जरुरत के साथ-साथ संवेदना का भी सम्पुट था।

जबकि ज़ारवादी रुसी साम्राज्य, प्रसियाई साम्राज्य और ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य – तीनों ने बाकी के वेस्टर्न यूरोप के लिबरल संसदीय विचारधाराओं से उलट अरिस्टोक्रेटिक एकतंत्रीय प्रणाली को ही तरजीह दी।

पूरे उन्नीसवीं सदी के दौरान रूस ने यूरोप में अपने राजनीतिक और रणनीतिक हितों की वक़ालात जर्मन और ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य के साथ सहयोगात्मक गठजोड़ बनाकर ही किया था। रूस का रोमनोव कोर्ट लम्बे समय से प्रो-जर्मन नीतियों की वकालत करता हुआ था, शायद इसकी वज़ह यह भी थी कि दोनों ही साम्राज्यों में काफी घनिष्ट पारिवारिक सम्बन्ध थे। इसके इतर दोनों ही मुल्कों में यूरोपियन लिबरलिज़्म के विरोध में आपसी समझ का होना – शायद इस समझ का होना ज्यादा महत्वपूर्ण मालूम होता है, यह समझ और इसके ऊपर अमल इन्हे समूचे यूरोप में एक अलग पहचान देता था।

पर यह गठजोड़ ये आपसी समझ 1905 की क्रांति के बाद धराशायी हो जाता है, कम-से-कम रिश्तों में शिथिलता तो जरूर आ जाती है। क्योंकि ज़ार के रूस में अब दौर बदल चूका था, विदेश नीति अब पब्लिक ओपिनियन को नज़रअंदाज़ करके एकांगी होकर नहीं चलाया जा सकता था। ड्यूमा और प्रेस एक एग्रेसिव विदेश नीति के पक्ष में थे। उनका साफ़ तौर पर कहना था कि हमें बाल्कन में रूस के हितों की पुरजोर तरीके से रक्षा करनी चाहिए। साथ-ही-साथ, उस वक़्त रूस के आमजनों में अपने बाल्कन स्लाव भाई-बहनों के प्रति संवेदना की एक लहर सी चली थी। उनका मानना था कि बाल्कन में अगर अब हम अपने स्लाव भाई-बहनों को सक्रियता से सपोर्ट नहीं करेंगे, उनके ऑटोमोन तुर्कों से उनकी लड़ाई में, स्लाव-राष्ट्रीय जागरण में एक स्लाव-साम्राज्य होने के नाते मदद नहीं पहुचायेंगे तो फिर इतने बड़े साम्राज्य का होना और इसकी शक्ति का उपयोग न होना क्या संदेश देगा हमारे देश के प्रति। और आखिर हम नहीं खड़े होंगे अपने बाल्कन स्लाव भाइयों के प्रति तो फिर कौन खड़ा होगा। जर्मनी तो साफ़ तौर पर ऑस्ट्रियाई खेमे में ही है न।

इन सभी बातों का नतीजा ये हुआ कि ज़ार को सामयिक परिस्थितियों के सामने घुटने टेकने पड़े और पब्लिक ओपिनियन के साथ सुर मिलाना पड़ा। अखिल-स्लाव राष्ट्रीय जागरण के दौर में आमजनों की संवेदनाएँ बेहद प्रबल थी जिसने ज़ार शासनक्रम को मजबूर किया कि वो बाल्कन क्षेत्र में अपने हितों की सशक्त रूप से रक्षा करें। ठीक इसी का नतीजा ये  कि वर्षों के यार जर्मनी और रूस जंग के मैदान में आमने-सामने खड़े थे। रूस में लोग अधिक-से-अधिक जर्मनफोबिक हुए जा रहे थे। कोर्ट का जर्मनी के प्रति खास झुकाव और एम्प्रेस अलेक्जेंड्रा का जर्मन मूल का होना लोगों में जर्मनी के प्रति उबाल मार रहे द्वेष को क्रांति की हद तक ले जा चूका था। 1914 तक दरबार में भी यह धारणा मजबूत हो चली थी कि बाल्कन के अपने स्लाव भाइयों की मदद की जाए। स्वयं ज़ार निकोलस द्वितीय भी यह महसूस कर रहा  था कि ऑस्ट्रिया के खिलाफ कुछ कठोर कदम उठाने का सही वक़्त आ चुका हैं। ऑस्ट्रिया की हरकतें कुछ इस दर्जा गंभीर हो चली थी जिनसे कि जर्मनी के भी रूस से टकराव बढ़ने के आसार बढ़ चले थे। पर ज़ार के विदेश मंत्री एस.डी. सजोनोव का कुछ और ही मानना था। सजोनोव का साफ़ तौर पर यह मानना था कि रूस की सैन्य ताकत जर्मनी के साथ इस वक़्त एक युद्ध करने की बिलकुल भी नही है। हालांकि सजोनोव ने कूटनीतिक तौर पर रूस के लिए एक मित्रवत गठजोड़ ढूंढने की पूरी कोशिशें की।

वही दूसरी और रूस के ही एक मंत्री डरनोवो ने ज़ार को साफ़ तौर पर चेताया भी कि रूस हालिया स्तिथि में एक लम्बे सैन्य युद्ध के लिए किसी भी स्वरुप से तैयार नहीं हैं। अगर रूस युद्ध में अपने आप को झोंकता है तो निश्चित रूप से एक सामाजिक क्रांति का होना तय है।  

“The trouble will start with the blame of the Government for all disasters … The defeated army, having lost its most dependable men, and carried away by the tide of primitive peasant desire for land,, will find itself too demoralized to serve as a bulwark of law and order. The legislative institutions and the intellectual opposition parties, lacking real authority in the eyes of the people, will be powerless to stem the popular tide, arousing by themselves, and Russia will be flung into hopeless anarchy.”

  • Durnovo.

निकोलस स्वाभाविक रूप से अनिश्चय के भँवर में फँसा हुआ था। अगर वो युद्ध का चुनाव करता है तो डरनोवो की कही हुई बात के सच होने का डर सताता है। लेकिन अगर वो युद्ध को अस्वीकृत करता है तो फिर समूचे रूस में राष्ट्रवादी संवेदना की लहर में राजपरिवार के खिलाफ में बयार चल पड़ेगी जिसे पहले से ही प्रो-जर्मन माना जाता है। और इसके कई नतीजों में एक नतीजा यह भी हो सकता है कि ज़ार को अपनी सत्ता खोनी पड़े। रूस के पास बेहद कम वक़्त था अगर रूस को अपनी फ़ोर्स मोबिलाइज़ करने की बात आती तो उसे अच्छा-खासा वक़्त लगता – छोटे मुल्कों में जहाँ बेहतर रेलवे नेटवर्क था उनके लिए सेना को सीमा पर तैनात करना ज्यादा तेज और आसान था।

28 जुलाई को आर्कड्यूक फ्रैंज फर्डीनांड की सर्बियन राष्ट्रवादियों के द्वारा हत्या के करीब एक महीने के बाद ऑस्ट्रिया ने सर्बिआ के खिलाफ युद्ध का उद्घोष कर दिया। ज़ार ने पार्शियल मोबिलाइजेशन का आदेश दे दिया और साथ ही जर्मन कैसर से अपील की कि आप ऑस्ट्रियंस को रोकें ताकि युद्ध को रोका जा सके। पर ठीक उसी वक़्त सजोनोव ने फुल मोबिलाइजेशन का आदेश दिया। उसका यह तर्क था कि रूस के खिलाफ जर्मनी जरूर युद्ध का एलान करेगा।  निकोलस को उसने वार्न करते हुए कहा कि अगर रूस ने ऑस्ट्रिया के खिलाफ कोई फौरी कार्यवाही नहीं की और ज़ार अपने तलवार की धार को ऑस्ट्रिया के ऊपर नहीं चलाया तो जनता उन्हें माफ़ नहीं करेगी। इसकी बेहद प्रबल सम्भावना होगी कि रूस में क्रांति होगी और ज़ार को सत्ता से हाथ धोना पड़ जायेगा। खैर अनमने ढंग से ज़ार राजी हो गया। 31 जुलाई को उसने अपनी सेना को युद्ध का आगाज़ करने का हुक्म जारी कर दिया। हालांकि जर्मनी ने अगली सुबह 1 अगस्त को रूस के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया। शायद इतिहास कुछ और होता अगर ये युद्ध का एलान करने के बजाय ऑस्ट्रिया और सर्बिआ के बीच की अदावतों को और आग न दी गयी होती। इतिहास कुछ और होता अगर वार्ता का रास्ता अख्तियार किया गया होता।  खैर युद्ध का आगाज़ होता है।

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